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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२०६

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१९५. मनुष्यका दोष

मैं जानती हूँ कि दूसरोंको सलाह देना हमारे लिए सबसे आसान काम है, लेकिन यह तो भुक्तभोगी ही समझते हैं कि बन्दर कितनी बर्बादी कर जाते हैं और चूँकि मैं भी उनके छोटे-छोटे शरारती हाथोंमें कुछ नुकसान उठा चुकी हूँ इसलिए मुझे ऐसे लोगों से पूरी हमदर्दी है।

लेकिन प्रश्न है कि इस संकटपूर्ण स्थिति के लिए दोषी कौन है--मनुष्य या बन्दर? बन्दर शहरोंमें आते क्यों हैं; वे अपनी जान हथेलीपर लेकर, अपने प्यारे बच्चोंकी जिन्दगी जोखिममें डालकर भोजनकी तलाशमें मनुष्योंके रिहायशी मकानोंके पास आते ही क्यों हैं?

माउंट आबूमें एक अधिकारीने इधर हाल ही में मुझसे कहा: "बन्दर बड़ी मुसीबत ढाते हैं, फिर भी हम उनको गोलोसे नहीं मार सकते। बन्दरोंका संकट साल-दरसाल बढ़ता ही जा रहा है, पता नहीं क्यों। "

तिसपर भी कारण स्पष्ट है। जंगलका एक-एक पेड़ इस बातकी गवाही दे रहा है कि मनुष्य अपने स्वार्थमें अन्धा होकर किसीके भी हिताहितका जरा ख्याल नहीं करता। जम्बू, करेण्ड और बोड़के हर पेड़को उसने एकदम फलविहीन बना दिया है।

आबूके भील लोग सैकड़ों, हजारों डलियाँ भर लेते हैं। आप उन फलोंको आबू रोडपर सड़ते देख सकते हैं।

साहबोंके खानसामोंने करेण्डका मुरब्बा बनाना सीख लिया है। सिर्फ इतनी ही मेहनत तो दरकार है कि फल इकट्ठे करके चीनी जुटा ली जाये।

मनुष्य खुद तो पशुओं और पक्षियोंके अधिकारोंका निर्दयतापूर्वक हनन करता है, लेकिन अपने अधिकारोंको अनुल्लंघनीय मानकर उसमें हस्तक्षेप करनेवालोंको कठोर दण्ड देता है।

क्या देवी-देवता भी मनुष्य के साथ ऐसा ही बर्ताव करते हैं? मनुष्य जातिपर जो अनेक विपत्तियाँ आती हैं, उनके पीछे मुझे यही भाव दिखाई पड़ता है कि प्रकृति इस तरह पशु-पक्षियोंके अधिकारोंके लगातार हननका भयंकर प्रतिशोध लेती है।

यह प्रकृतिका प्रतिशोध है: ऐसा प्रतिशोध जैसा कि जहाजोंके उन नाविकोंके सिरपर टूटता है जो आनेवाले तूफानको सूचना देनेवाले सभी पक्षियोंको गोलीका निशाना बना चुके हैं। मनुष्यने हजारों लाखों पक्षियोंको नष्ट