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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२१७

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२०९. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको

वर्धा
७ दिसम्बर, १९२८

प्रिय सतीश बाबू,

आपका पत्र मिला। आपने कुछ कठिनाइयाँ गिनाई हैं, मैं उनको समझता हूँ। परन्तु यह भी अपने आपको दबाकर रखनेकी ही बात है। मुझे जो भी कहना था, मैं कह चुका हूँ। हम प्रदर्शनी में शामिल-भर हो रहे हैं जितनेतक हमसे बन पड़े उतनेतक और जितने तटस्थ हम रह सकें उतने तटस्थ भावसे।[] बिलकुल स्पष्ट है कि समिति मिलके बने वस्त्रोंकी प्रदर्शनीसे बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाये थी और इसीलिए उनके दृष्टिकोण से मिलके वस्त्रोंको हटा देना एक काफी बड़ी बात हुई।

हृदयसे आपका,

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३७७५) की फोटो-नकलसे।

 

२१०. पत्र : एक्सेल जी॰ नडसेनको

सत्याग्रहाश्रम, वर्धा
७ दिसम्बर, १९२८

प्रिय मित्र,

सचमुच मेरी बड़ी इच्छा थी कि मैं आपका अनुरोध तुरन्त मान लूँ। परन्तु मेरे लिए वास्तवमें शारीरिक रूपसे वह कर पाना लगभग असम्भव है। इस 'लगभग' शब्दका प्रयोग मात्र शिष्टतावश किया गया है, अर्थकी दृष्टिसे नहीं। इसलिए मेरी शुभकामनाएँ-भर लेकर मुझे क्षमा कर दीजिए। हाँ, आप अपनी पत्रिकाके लिए मेरे लेखोंमें से जो भी चाहें ले सकते हैं।

हृदयसे आपका,

एक्सेल जी॰ नडसेन
ब्रेडगेड
९० स्कर्न, डेनमार्क

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३७७६) की फोटो-नकलसे।

  1. देखिए "पत्रः सतीशचन्द्र दासगुप्तको", १३-१२-१९२८।