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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२२७

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२२४. पत्र : नारणदास गांधीको

[८ दिसम्बर, १९२८ के बाद][]

चि॰ नारणदास,

तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारी सलाह मुझे ठीक लगती भी है और नहीं भी लगती। यदि सन्तोक और राधा तथा रुखीका मन आश्रममें हो, वे सादा जीवन सह सकती हों और यदि उन्हें संयुक्त भोजनालय पसन्द आता हो तो तुम्हारी सलाह मुझे ठीक लगती है। यदि वे आश्रम में ओत-प्रोत होनेके लिए तैयार हों तो उन्हें उसके आदर्शों में श्रद्धा रखकर प्रति व्यक्ति १२ रुपये में अपनी गुजर चलानेका प्रयत्न करना चाहिए। यह राशि कम पड़े तो वे मुझसे कह सकती हैं। ऐसी बात तो है नहीं कि हम किसीको बीमार होने देंगे या मरने देंगे। मंजुलाका खर्च ज्यादा आयेगा तो वह कुछ काशीके पाससे नहीं मिलेगा। मैं उनसे जिस वस्तुकी आकांक्षा करता हूँ, वह है--आश्रम में श्रद्धा और गरीबी में रहने की तैयारी। यह मैं न उनमें देख सका हूँ, न दूसरोंमें। किन्तु सन्तोक और राधा तथा रुखीमें जब मैं यह वस्तु नहीं देखता तो मुझे यह बात गड़ती है। उनके लिए सारे आश्रमको नहीं बिगड़ने दिया जा सकता। दूसरोंको यदि न पुसाये तो वे जा सकते हैं। सन्तोकको न पुसाये तो भी आश्रमको उसका भरण-पोषण करना होगा। यह मेरी मानसिक स्थिति है। किन्तु तुम सब भाई जो राय दोगे वही मेरे लिए अन्तिम होगी। भाइयोंमें भी इसका विचार तुम्हींको करना है और उन्हें तथा मुझे दिशा दिखानी है। राधाको वेतन दिया जाये, यह तो मैं लिख ही चुका हूँ। मैंने राधाको पत्र लिखा है। उसका जवाब उसने अभीतक नहीं दिया।

बापूके आशीर्वाद

[गुजरातीसे]
बापुना पत्रो--श्री नारणदास गांधीने
  1. राधाको वेतन देनेके उल्लेखसे जान पड़ता है कि यह "पत्र : छगनलाल जोशीको", ८-१२-१९२८ के बाद लिखा गया था।
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