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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२३१

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सुन्दर पिंजाई

यदि पण्डित मोतीलाल, जवाहरलाल और मेरा अनुमान ठीक है तो लाहौर और लखनऊमें किया गया अहिंसाका पालन एक शुभ लक्षण है। सामान्यतः जितने दिनमें हमारे मामलेके तय होनेकी आशा की जाती है वह उससे बहुत जल्दी तय होगा। फिर वह चाहे अहिंसासे तय हो अथवा हिंसासे। आजकी त्रिशंकुवाली दुविधाभरी स्थिति लम्बे अर्सेतक नहीं चलेगी । किन्तु इतना तो स्पष्ट दिखाई देता है कि नेताओंके मार खानेसे ही स्वराज्य नहीं मिलेगा। अहिंसा या हिंसाके मार्गपर चलते हुए भारी बलिदान दिये बिना काम नहीं चलेगा। प्रभुसे मेरी प्रार्थना तो यह है कि लोगोंने १९२०में अहिंसाकी जो प्रतिज्ञा ली थी, वे उसका पालन करते हुए बलिदान करें और संसारके इतिहास में भारतको अहिंसाकी लड़ाई में प्रधान स्थान मिले, क्योंकि इस हिंसा-व्यथित विश्वके लिए शान्तिकी परम आवश्यकता है और शान्तिका मार्ग दिखानेवाला कोई देश यदि आज नजर आता है तो वह भारत ही है।

आयोगकी रक्त-रंजित यात्राके सम्बन्धमें विचार करते हुए एक खेदजनक और लज्जाजनक बात है; जिसे यों तो हमें भूल जाना चाहिए किन्तु उसे भुलाना बहुत कठिन है। लोगोंका जो अपमान होता है उसका प्रभाव आयोगके अंग्रेज सदस्योंपर कुछ नहीं होता, यह बात तो शायद समझमें आने योग्य मानी जा सकती है; किन्तु आयोगमें जो भारतीय सहायक सदस्य नियुक्त किये गये हैं वे इस अपमानको सहते हुए अपने पद से कैसे चिपके हैं! यह बात आश्चर्य और दुःख उत्पन्न करती है। इन सदस्योंके व्यवहारमें हमें अपनी दुर्बलता मूर्त रूपमें दिखाई दे सकती है। वे यह जानते हैं कि आयोगके बहिष्कारमें भारतके सभी दलोंके अग्रणी लोग सम्मिलित हैं। वे ऐसे बहिष्कारकी भी परवाह नहीं करते, इस बातको लोग कैसे भूल सकेंगे?

[गुजराती से]
नवजीवन, ९-१२-१९२८
 

२२७. सुन्दर पिंजाई

कपास सम्बन्धी क्रियाएँ किसी समय इतनी प्रचलित थीं कि उनके आधारपर संसारकी सभी भाषाओंमें कितनी ही कहावतें प्रचलित हो गई और कितने ही अलंकारोंका जन्म हुआ। कोई बहुत बारीकीसे किसीकी भूल निकालता हो तो कहते हैं "आप तो बहुत महीन कातते हैं।" कोई बेमतलबकी बात करता रहता हो और उसमें दूसरोंकी निन्दा भी हो तो "यह क्या चरखा चला रखा है आपने" इस तरह कहते हैं। इससे मालूम होता है कि कातने-पींजनेकी कला में कम-ज्यादा कताई या पिजाईके होने आदिका भी लोगोंको ज्ञान था। आज हम यह ज्ञान भूल गए हैं। इससे भाषामें कपासकी क्रियासे सम्बन्ध रखनेवाले शब्दोंके अनेक सूक्ष्म प्रयोगोंको भी भूल गये हैं। अब इस क्रियाका पुनरुद्धार हो रहा है। उसे यज्ञके समान माननेवाले उसे सुन्दर बनानेका प्रयत्न कर रहे हैं और रात-दिन उसके सुधारकी चिन्ता किया करते हैं। वे जानते हैं कि ज्यों-ज्यों इन क्रियाओंमें सुधार होते जायेंगे, त्यों-त्यों