२३१. पत्र : छगनलाल जोशीको
रविवार [९ दिसम्बर, १९२८][१]
तुम्हारा पत्र मिल गया है। लक्ष्मीदास या महादेवके न आ सकनेसे तुम्हें घबराना नहीं चाहिए। आखिरकार बोझ तो मन्त्रीको ही उठाना है।
चरखा-संघके साथ हमारे सम्बन्धके[२] विषयमें लक्ष्मीदासकी राय समझ सकता हूँ। उसके और तुम्हारे दोनोंके विचारोंका समर्थन भी किया जा सकता है। किन्तु अन्तमें निर्णयात्मक राय तो तुम्हारी ही मानी जायेगी। क्योंकि जो निर्णय लिया जायेगा उसपर अमल तो तुम्हें कराना होगा। जिसके हाथमें संस्थाका प्रबन्ध हो उसके मनकी व्यवस्था ही प्रारम्भ की जानी चाहिए। किन्तु मुख्य बात तो तुम्हारे और नारणदासके बीच मेल बैठनेकी है। यहाँ बैठे-बैठे तो मुझे यही लगता है।
बापूके आशीर्वाद
यह तो मुझे भी लगा कि शारदाबहनका पत्र स्पष्ट नहीं है। तुम शायद उनसे बात करके ज्यादा समझ सकोगे।
तुम दूसरोंका अनुकरण करनेकी भूल नहीं करना। खानेके लिए दूध आदि जो-कुछ भी जरूरी हो लेते रहना। मेरी तो ईश्वर निभा देता है; क्योंकि मेरे प्रयोग स्वयंस्फुरित हैं। तुम ऐसा करोगे तो वह नकल होगी। शरीरको ताकतवर बनानेके लिए जैसी खुराक जरूरी हो वैसी लेते रहना और काममें जुटे रहना। मेरे प्रयोगोंके कारण आजतक मेरा काम रुका नहीं है, बल्कि मैं तो मानता हूँ कि उनसे मेरा काम आगे ही बढ़ा है क्योंकि उनके कारण मैंने चित्तकी प्रसन्नता प्राप्त की है।
बापू
- [गुजराती से ]
- बापुना पत्रो--श्री छगनलाल जोशीने