२४२. पत्र : छगनलाल जोशीको
वर्धा
११ दिसम्बर, १९२८
'मन्दिर समाचार' अब भी पढ़ा नहीं जाता। यदि मशीनमें कुछ खराबी है तो उसे ठीक कर लो। यदि छापनेवालेका दोष हो तो भी पता लगाना।
अपने सूतकी जाँच करानेपर देखा कि उसका अंक ३०, समानता ९३ और मजबूती ६८ है। आजकल मैं रोज ३० अंकका सूत ही कातता हूँ; एक घंटे में १६० तारसे ज्यादा नहीं कात पाता।
क्या गायें पहलेसे कुछ ज्यादा दूध देने लगी हैं? सब लोग नियमपूर्वक दैनन्दिनी लिखते हैं न?
ऊपरका पत्र रातको लिखा था।
मंगलवार
तुम्हारा पत्र मिल गया है।
चि॰ केशुसे पूछनेपर उसने कहा है कि जैसा तुम मानते हो, उसने वैसा कुछ नहीं लिखा। उसने तो मेरी दशाका वर्णन करते हुए यह सलाह दी थी कि सन्तोक आदि आश्रम छोड़ दें, तो अच्छा हो। इस विषयमें केशु अपनी मर्यादाका पालन करता है; ऐसा मैं मानता हूँ। जो कुछ भी हो तुम तो अपना फर्ज दृढ़तापूर्वक अदा करो। अपने विचार तो मैंने तुम्हें साफ-साफ बता ही दिये हैं। नारणदासने जिस सुविधाका सुझाव दिया है, उसके दे दिये जानेपर उन सबको अपनी इच्छासे चलने दो।
भाई शंकरलालके कथनका बहुत अधिक अर्थ मत निकालना। उन्हें इस प्रकार बोलनेकी आदत है। लेकिन उसमें थोड़ा-सा सत्य तो है ही। इस सत्यको स्वीकार करके हम अपने दोषोंको दूर करें।
हरएक जानी-मानी संस्थाके सदस्योंके मनमें कुछ-न-कुछ अहंकार तो आ ही जाता है। उससे हम भी मुक्त नहीं हैं। किन्तु बादमें चरखा संघका कार्यालय आश्रमसे बाहर चला जाये तो मुझे दुःख नहीं होगा। हमें तो बोझ उठाना है, फर्ज अदा करना है; अधिकार नहीं भोगना। एक बोझ हलका हो जाये और हममें शक्ति हो तो हम दूसरा बोझ उठा लें। चरखा-संघका कार्यालय आश्रमसे बाहर चला जाये और हम उसे अपने कार्यकर्त्ता दे सकें तो वह भी करें। किन्तु बात तो यह है: इस समय निर्णय तो तुम्हें और नारणदासको मिलकर करना है। तुम दोनों दूध-चीनीकी तरह घुलमिल सको तो विभाग ठीक भी चले और उसे गौरव भी मिले। तुम दोनोंमें दूरी हो तो विभाग कभी नहीं चल सकता। उस अवस्थामें वह मन्दिरसे बाहर जाता हो तो जाये। मैं बिलकुल तटस्थ हूँ।