२४८. पत्र : नरगिस कैप्टेनको
वर्धा
१२ दिसम्बर, १९२८
तुम्हारा पत्र मिला और 'चैक' भी। मैं जानता हूँ कि तुम मेरी ओरसे पत्र पानेकी अपेक्षा नहीं रखती, हालाँकि तुम मुझे जब-तब पत्र लिखती ही रहोगी। यह एक तरफा हिसाब मुझे सचमुच बड़ा पसन्द है।
पर तुम्हारी सेहत अब पहलेसे अच्छी है या नहीं? पहलेसे ज्यादा शक्ति अपने अन्दर महसूस करती हो या नहीं? सच मानो, मैं उतना ज्यादा बीमार नहीं था, जितना तुम समझ रही थी। सचाई तो यह है कि मेरी बीमारी असलमें एक छोटी-मोटी गड़बड़ी-भर थी।
जो भी लिखनेका मन करे, जरूर लिखना। क्या कलकत्ता नहीं आ रही हो? या अभी बदनमें इतनी ताकत महसूस नहीं करती? लेकिन यदि न आनेका ही फैसला करो तो वह लम्बा पत्र जरूर लिखना जिसका तुमने वादा किया है। मैं जरूर ही उसे पढ़नेके लिए समय निकालने की कोशिश करूँगा और अगर उसमें कोई ऐसी बात न हुई जिसके बारेमें कुछ कहना मुझे जरूरी लगा तो मैं उसका उत्तर नहीं दूँगा।
बम्बई
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३७८३) की फोटो-नकलसे।
२४९. पत्र : ई॰ सी॰ डेविकको
वर्धा
१२ दिसम्बर, १९२८
आपका पत्र मिला। आपसे मैसूरमें भेंट न कर पानेका मनमें सचमुच बड़ा खेद रहा, परन्तु वह सम्भव भी नहीं था। कोशिश तो मैंने की, लेकिन सफल नहीं हो पाया।
डॉ॰ मॉटसे[१] मिलकर सच ही मुझे बड़ी खुशी होगी। भेंटका समय तो ७ से १५ जनवरी, १९२९ तकके बीच ही शायद ज्यादा ठीक रहेगा। इस समय तो मैं इतना ही कह सकता हूँ कि मैं इन तारीखोंमें शायद साबरमती में ही मौजूद रहूँगा
- ↑ डॉ॰ जॉन आर॰ मोंट, 'विश्व ईसाई विद्यार्थी संघ' के अध्यक्ष।