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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२५२

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२५१. पत्र : एन॰ आर॰ मलकानीको

वर्धा
१२ दिसम्बर, १९२८

प्रिय मलकानी,

आपके पत्रका उत्तर देने में मैंने बेजा देरी कर दी है। पर मैं जानता था कि ऐसी जल्दीकी भी कोई बात नहीं। मेरी सभी योजनाओंमें जमनालालजी सदा मेरे साथ रहते हैं। मैंने आपका पत्र उनको दिखलाया था और उनको बतलाया था कि मुझे आपसे क्या-क्या आशाएँ हैं। खुशी तो उनको बहुत हुई लेकिन उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैंने आपको बतला दिया है कि आश्रम में रहनेवालोंसे क्या-क्या अपेक्षाएँ की जाती हैं। मैंने उनसे कह दिया था कि मैं जितना जानता था उतना मैंने बतला दिया है। आप तो आश्रमके जीवनको समझते ही हैं। आपको मालूम ही है कि ब्रह्मचर्य व्रत लेना अनिवार्य है और आश्रम-भरकी एक ही रसोई है। आश्रमको अब उद्योग-मन्दिर कहने लगे हैं। जमनालालजीको आशंका है कि आश्रमका जीवन जिस साँचे में ढल गया है और ढलता जा रहा है वह आपकी पत्नीको[] शायद माफिक न आ पाये।

इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप अपनी पत्नी से सलाह कर लें और उनको बिलकुल साफ-साफ समझा दें। आश्रम नियमावलीकी एक-एक पंक्ति पढ़ जाइए। उद्योग-मन्दिरमें उसका पालन अनिवार्य है। अस्पृश्यता-निवारणके कामके लिए आपके यहाँ आनेका मतलब है कि आप अपना भाग्य आश्रमके साथ जोड़ दें और हमेशा के लिए अपना जीवन इसी उद्देश्यके लिए समर्पित कर दें, क्योंकि हमारा यह काम इसके लिए नियुक्त एक मन्त्रीके जरिए संगठित किया जायेगा, जो अपना सारा समय और ध्यान केवल इसी काम में लगायेगा। जमनालालजीका कहना है कि यदि आप सोचते हों कि यह काम इतना रुचिकर नहीं जिसमें पूरा समय खपाया जाये और यदि आपकी पत्नी इसी काममें पूरे समय लगे रहनेसे बहुत खुश न रहे तो आपके यहाँ आनेसे कोई लाभ नहीं होगा। आप उनसे सलाह करके मुझे लिखें कि आप दोनोंने सम्मिलित रूपसे क्या तय किया है।

मैं यहाँ २० तारीखतक हूँ। मैं २३ तारीखको कलकत्ता पहुँच रहा हूँ, जहाँ मेरा पता यह रहेगा--मारफत जीवनलाल भाई, ४४, इजरा स्ट्रीट, कलकत्ता।

हृदयसे आपका,
बापू

श्रीयुत एन॰ आर॰ मलकानी
हैदराबाद (सिन्ध)

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ८९०) की फोटो-नकलसे।

  1. दिनांक १४ नवम्बर, १९२८ के अपने पत्र में उन्होंने लिखा था "मैने...आश्रम में...अपने भावी कामके बारेमें अपनी पत्नीसे सलाह कर ली है" (एस॰ एन॰ १३७२३)।