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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२५४

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२५४. पत्र : प्रभावतीको

दुबारा नहि पढ़ गया हूँ

१२ दिसम्बर, १९२८

चि॰ प्रभावती,

तुमारा खत मीला। गभरानेका कोई कारण नहि है। स्वसूरको लीखो:

"मेरे लीये आपकी इच्छा आज्ञा हि होनी चाहीये। मेरे पिताजी तो यहि चाहते हैं जैसा आप लोगोंका हुकम मीले ऐसी हि मैं करूं। मेरा धर्मसंकट तो यह है कि आपके पुत्रके खत ठीक अमेरिकासे चले आते हैं। उसमें यहि आज्ञा है कि मैं आश्रम में हि रहुं और पढुं। वे तो यह भी चाहते हैं कि मैं इंग्रेजी भी अच्छी तरहसे पढ़ लुं। मुझको तो आश्रममें अच्छा लगता है। बापुजी मुझको पुत्री तुल्य रखते हैं। बाकी भी कृपा रहती है। राजवंसी देवीजीके[] जानेके बाद मुझको स्त्री विभाग में रखनेका प्रबंध है। स्त्री विभागमें मैं बिलकुल सुरक्षित हुं। इसलीये मेरी इच्छा तो है की आपके पुत्रकी आज्ञानुसार मैं यहीं रहुं। फिर आपकी जैसी आज्ञा हो इतना कह दूं मेरे लीये आप चिंता न करें। मैं बड़ी सावधानी से यहां रहती हूं और आश्रममें काफी औरत रहती हैं सबके साथ मेरा संबंध अच्छा है।"

इसमें भाषाकी सुधारणा करना चाहीये करो। पिताजीको भी खबर दे दो क्या हो रहा है। मृत्युंजयको सब हाल कह दो। पतिके खतकी नकल भेजो।

जो कुछ भी होवे तुमारे निश्चिन्त होकर रहना। 'सुख दुःखे समे कृत्वा'[] श्लोक याद करो। हिम्मत रखो, राम स्मरण करो।

बापूके आशीर्वाद

जी॰ एन॰ ३३४२ की फोटो-नकलसे।

  1. राजेन्द्रप्रसादकी धर्मपत्नी और मृत्युंजयकी माता।
  2. गीता, अध्याय २ श्लोक ३८।