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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२५५

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२५५. अन्धकूप[]

पण्डित जवाहरलाल नेहरू अपने एक निजी पत्रमें लखनऊकी घटनाओंका वर्णन करते हुए लिखते हैं:

कल सुबहकी एक घटना आपको शायद दिलचस्प लगेगी। मैंने अपने बयान में उसका जिक्र नहीं किया है। हम लोगोंको घुड़सवार और पैदल पुलिसने स्टेशन के पासतक खदेड़ा ही था कि एक नौजवान मेरे पास आया और कहने लगा कि अगर में पिस्तौलका इस्तेमाल करना चाहूँ तो वह उसी दम दो पिस्तौल लाकर मुझे दे सकता है। मैंने उसे विद्यार्थी समझा। हम पुलिसके डण्डों और लाठियोंका मजा चख ही चुके थे और भीड़में काफी गुस्सा और उबाल था ही। मेरा खयाल है, उसने सोचा होगा कि वैसा सुझाव रखनेके लिए यही सबसे अच्छा मौका है। मैंने उससे कहा कि बेवकूफ मत बनो। थोड़ी ही देर बाद, यों ही संयोगसे मुझे पता चला कि वह गुप्तचर विभागका आदमी था।

पण्डित जवाहरलाल नेहरूको इससे कोई खतरा नहीं हो सकता था, क्योंकि उनके पास छिपानेकी तो कोई बात है नहीं। देशकी स्वतन्त्रता प्राप्ति करनेकी उनकी अपनी योजनामें पिस्तौलोंके लिए अगर कोई जगह होती, तो उनके लिए बाहरके किसी आदमीको पिस्तौल जुटानेका प्रस्ताव रखनेकी जरूरत ही नहीं पड़नेवाली थी। वे तो स्वयं ही खुले आम पिस्तौल लेकर चलते और जब ठीक मौका समझते उसका बड़े कारगर ढंगसे इस्तेमाल भी करते। इसलिए गुप्तचरोंके जाल फरेबसे उनको कोई खतरा नहीं था। और जो बात पण्डित जवाहरलाल नेहरू पर लागू होती है वह एक हदतक सभी कांग्रेसियोंपर भी लागू होती है। कांग्रेसवालोंने अब बन्द कमरोंमें गुप्त सभाएँ करना छोड़ दिया है। अब उनको गुप्तचरोंका भय नहीं सताता।

  1. गांधीजीने १६-१२-१९२८ के नवजीवनमें इसी विषयपर अपना एक लेख इस तरह शुरू किया था: "जहां भी हमारी नज़र जाती है, हमें दूर दूरतक सरकार द्वारा बिछाये तरह-तरहके जाल दिखाई पढ़ते हैं, किसी-किसी घातक जालमें हम फँस भी जाते हैं। कुछ जाल साफ तौरपर सामने दिखाई पड़ते हैं, कुछ और हैं जो नजरोंसे छिपे रहते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो हमें ललचाते हैं। शराबघर खुले जाल हैं; गुप्तचर विभाग छिपा हुआ जाल है; स्कूल, विधानसभाएँ, कचहरियाँ वगैरा ललचानेवाले जाल हैं।...बस मैं तो इतना ही जानता हूँ कि इन जालोंमें फँसनेसे हमें एक ईश्वर ही बचा सकता है। और ईश्वरसे रक्षाकी प्रार्थनाको सुनवाई तभी होगी जब हमारे अन्दर अपार आस्था और अटल संकल्प हो।" अन्तमें, उन्होंने लिखा था: "यदि हम अपने अन्दर अपने-आपको समर्पित कर देनेकी भावना पैदा कर लें तो हम इसी क्षण अपने देशको मुक्त करा सकते हैं और हमारी मुक्तिके साथ संसारके अनेक देशोंकी मुक्ति भी जुड़ी हुई है।"