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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२६२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

एक वाक्य में समो दी है: "चिन्ता किसी बातकी मत करो।" कृष्णदासने बतलाया है कि हेमप्रभादेवी अपने शरीरको थका-थका कर जर्जर करती जा रही है। उनको ऐसा नहीं करना चाहिए और शरीरको चुस्त-दुरुस्त रखनेके लिए जो छोटी-मोटी शारीरिक सुख-सुविधाएँ जरूरी होती हैं उनसे अपने-आपको वंचित नहीं रखना चाहिए।

प्रदर्शनीके बारेमें आपने जो लिखा वह मैंने देख लिया है।[] मुझे उसपर कोई आपत्ति नहीं। इतना ही पर्याप्त है कि हम विरोध न करें और जहाँ भी हमारी मददकी जरूरत हो हम मददके लिए तैयार रहें और यह मदद हमको पूरी शुभ कामनाके साथ, बिना किसी झुँझलाहटके करनी चाहिए।

हृदयसे आपका,

श्रीयुत सतीशचन्द्र दासगुप्त

खादी प्रतिष्ठान

सोदपुर

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३७९४) की फोटो-नकलसे।

 

२६२. पत्र : काली कृष्णनारायणको

स्थायी पता
साबरमती आश्रम
१३ दिसम्बर, १९२८

प्रिय मित्र,

आपका पत्र मिला। मेरी राय तो यह है कि यदि ये प्रदर्शन पूर्णत: अनुशासनबद्ध तथा अहिंसापूर्ण बने रहें तो जनताको प्रशिक्षित करनेमें इनका भारी महत्त्व रहता है। इसीलिए इन प्रदर्शनोंको तबतक छोड़ना नहीं चाहिए जबतक एक यह बात यथासम्भव सुनिश्चित रहे कि कैसी भी उत्तेजना क्यों न हो प्रदर्शनकारी हिंसाका सहारा बिलकुल नहीं लेंगे।

हृदयसे आपका,

श्रीयुत काली कृष्णनारायण
लखनऊ

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४८२७) की फोटो-नकलसे।

  1. पत्रमें उन्होंने यह भी कहा था: "प्रदर्शनी-अधिकारियोंने मुझे कुछ भी नहीं लिखा।...समितिके प्रतिनिधि देश-भरमें घूमे और उन्होंने बंगाल, बिहार, आन्ध्र, इत्यादिसे संघके अतिरिक्त अन्य संस्थाओं द्वारा तैयार किया गया खद्दर खरीदा। उन्होंने इसी तरहसे कताई-प्रदर्शनोंकी भी व्यवस्था की। अखिल भारतीय चरखा संघका सम्मिलित होना तो उस सबके अतिरिक्त है और इसलिए व्यवस्था वही है जो पहले से चली आ रही है।"