२६४. पत्र : छगनलाल जोशीको
१३ दिसम्बर, १९२८
आज 'भाई' के बदले 'चिरंजीव' से शुरू किया है; अब यह चलता रह सकता है।
तुम्हें ११ तारीखकी डाक नहीं मिली इसमें मेरा दोष नहीं है। मैंने तो लिखा ही था। तुम्हें १२ तारीखको दो पत्र मिले होंगे। आखिरी घड़ीमें डाक भेजनेमें कभी-कभी ऐसा हो जाता है।
रमान खासी बड़ी बीमारी साथ लेकर आई है; मगर घबराना नहीं। इलाजका पूरा प्रबन्ध कर देनेसे सब ठीक हो जायेगा। उनकी दूसरी शिकायतें भी धीरे-धीरे दूर हो जायेंगी। कैलाशकी बीमारीके लिए डाह्मीबहन और नानुभाई जिम्मेदार हैं। आखिरकार बालकोंका पेट भी चाहे जैसा भार तो सहन नहीं कर सकता। धर्मकुमारके बारेमें भी यही है। स्वस्थ होते ही सब तरहकी छूट लेने लगता है। बेला-बहनकी तो प्रकृतिमें ही बीमारी लिखी है। वह भी अपनी जीभको वशमें नहीं रख सकती। और साबरमतीका पानी ऐसा नहीं कि हम सब प्रकारकी छूट ले लें। एक तरह से तो यह अच्छी बात है।
जिन्हें केवल खादी कार्यके लिए शिक्षा दे रहे हैं, उन आश्रमवासियोंका रु॰ १२ के हिसाब से खर्चका हिसाब खादी विभागसे लेनेमें मुझे कोई दोष नहीं दिखाई देता।
बाहरसे या अन्दरसे चाहे जैसी भी मुसीबत आये, तुम होशियार रहना। धीरज न छोड़ना। अपनी शक्तिसे बाहर काम न करना। जो भी जरूरी हो चुपचाप करते जाना; इससे कोई बोझ लगेगा ही नहीं।
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो : श्री छगनलाल जोशीने