२७४. पत्र : जे° डी° अत्रेको
स्थायी पता
साबरमती आश्रम
१४ दिसम्बर, १९२८
आपका पत्र मिल गया। इतना स्पष्ट है कि आपने मेरे लेख गौरसे नहीं पढ़े। 'क' कभी भी 'ख' की जान नहीं ले सकता, इसलिए कि 'क' में इतनी बुद्धि तो हमको माननी ही चाहिए कि वह समझ सके कि आत्महत्या करनेकी कोशिश करने-वाला 'ख' कुछ समयके लिए विक्षिप्त हो गया है । 'क' को अपने विवेकका उपयोग करना चाहिए, दूसरेकी बुद्धिपर निर्भर नहीं रहना चाहिए और किसी भी ऐसे व्यक्तिकी बुद्धिपर तो बिलकुल ही नहीं जो विक्षिप्त हो।
हृदयसे आपका,
३८, जाओबाकी बाड़ी
बम्बई–२
अंग्रेजी (एस° एन° १३८०३) की माइक्रोफिल्मसे।
२७५. पत्र : वी° एन° खानोलकरको
स्थायी पता
साबरमती आश्रम
१४ दिसम्बर, १९२८
आपका पत्र मिला। मैं अब खादी भण्डारसे लिखा-पढ़ी कर रहा हूँ। आपकी इस बात से मैं बिलकुल सहमत हूँ कि पूनियाँ यदि दी जायें तो वे अच्छे किस्मकी और कामके लायक होनी ही चाहिए।
आपने पत्रमें लिखा है कि आप धुनाई नहीं कर पाते, लेकिन पत्रके अन्तमें आपने एक पौंड रुई माँगी है। आप धुनी हुई रुई चाहते हैं, या घुननेके लिए रुई चाहते हैं?
हृदयसे आपका,
गणेश भवन, खार
जिला थाना
अंग्रेजी (एस° एन° १३८०४) की माइक्रोफिल्मसे।