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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२९२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

[पुनश्च :]

मेरे प्रयोगकी चिन्ता न करना। मेरा जीवन तो ईश्वरके हवाले है। इसके साथ मीराबहनका पत्र भेज रहा हूँ। अबसे जो पैसा आये[] उसे उसके नाम जमा कर देना। उसका जो खर्च हो वह आश्रमके खाते डाल देना। यह खर्च उस पैसे से नहीं काटना।

[गुजरातीसे]
बापुना पत्रो : श्री छगनलाल जोशीने
 

३०९. पत्र : जेठालालको

१९ दिसम्बर, १९२८

भाईश्री जेठालाल,

तुम्हारा पत्र मिला। मैंने आश्रम में चि° नारणदास गांधीको लिखा है। वे उत्तर देंगे। सन्तोष न हो तो मुझे फिर लिखिए।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (जी° एन° १३४७) की फोटो-नकलसे।

 

३१०. चर्चा : एक पूँजीपतिके साथ[]

[२० दिसम्बर, १९२८ से पूर्व]

ईश्वर न करे कि भारत भी कभी पश्चिमी देशोंके ढंगका औद्योगिक देश बने। एक अकेले इतने छोटे-से द्वीप (इंग्लैंड) का आर्थिक साम्राज्यवाद ही आज संसारको गुलाम बनाये हुए है। तब ३० करोड़की आबादीवाला हमारा समूचा राष्ट्र भी अगर इसी प्रकारके आर्थिक शोषण में जुट गया तो वह सारे संसारपर एक टिड्डी दलकी भाँति छाकर उसे तबाह कर देगा। यदि भारतके पूँजीपति अपना सारा कौशल धन- सम्पत्ति खड़ी करने में न लगाकर उसे परमार्थकी भावनासे जनताकी सेवामें ही लगा कर, जन-कल्याणके संरक्षक बनकर उस विपत्तिको टालनेकी कोशिश नहीं करेंगे तो इसका अन्त यही होगा कि या तो वे जनताको नष्ट कर डालेंगे या जनता उनको नष्ट कर देगी।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया,' २०-१२-१९२८
 
  1. उन दिनों मीराबहनके पिता हर माह ५० पौंड खर्चके लिए भेजा करते थे।
  2. प्यारेलालके लेख 'वर्षाकी चिट्ठी ' से।