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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२९३

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३११. चर्चा : काली मन्दिरके बारेमें[]

[२० दिसम्बर, १९२८ से पूर्व]

इसके बाद वह [ गांधीजी ] एक खादी कार्यकर्त्तासे मुखातिब हुए। वह भी उनके साथ था। उन्होंने कहा कि इच्छा न होते हुए भी उसे कलकत्ता[] जानेको राजी हो जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ उसकी जरूरत महसूस की जा रही थी। उनकी दलील थी—हम अगर कलकत्ताको बदल सकें तो हम समूचे भारतको भी बदल सकते हैं। और मैं खुद भी वहाँ चला जाऊँ और कलकत्ताको ही अपने कामका केन्द्र बना लूँ, पर बस एक बात है—और उन्होंने एक ऐसा दुःखपूर्ण रहस्य प्रकट किया जिसे वे इतने वर्षोंसे अपने मनमें ही दबाये आ रहे थे। रहस्य है—काली मन्दिर।

बस यही मेरी मुश्किल है। मैं उस दृश्यको देखना भी सहन नहीं कर सकता।वहाँ धर्मके नामपर जो निर्ममतापूर्ण अमानवीय कृत्य किया जाता है उसके विरुद्ध मेरी आत्मा विद्रोह कर उठती है। यदि मेरे अन्दर शक्ति होती तो मैं मन्दिरके द्वारपर अड़ कर खड़ा हो जाता और उसके प्रबन्धकोंसे कहता : एक भी निर्दोष पशुकी बलि चढ़ानेसे पहले तुमको मेरी गर्दनपर छुरी चलानी पड़ेगी। परन्तु मैं जानता हूँ कि आज वैसा करना मेरे लिए एक अवास्तविक, एक अर्थहीन क्रिया ही होगा क्योंकि मैं जीवित रहनेकी अपनी इच्छाको अभीतक पूरी तरह जीत नहीं पाया हूँ। और जबतक मैं उसे जीत नहीं लेता, तबतक अपने अपूर्ण अस्तित्वकी सूलीका भार मुझे अपने कंधोंपर ढोना ही पड़ेगा।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २०-१२-१९२८
 

३१२. चर्चा : अध्यापकों के साथ[]

[२० दिसम्बर, १९२८ से पूर्व]

किसी राष्ट्रीय शाला के अध्यापकोंका एक प्रतिनिधि मण्डल गांधीजीसे मुलाकात करने आया है। . . . बातचीत के दौरान एक अध्यापक अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहता है कि वह अहिंसाको केवल वैयक्तिक आचरणके एक सिद्धान्तके रूपमें ही स्वीकार करता है। और राजनीतिके क्षेत्रमें वह अहिंसाको केवल एक अस्थायी

 
  1. 'वर्धाकी चिट्ठी' से।
  2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके अधिवेशनके लिए।
  3. 'वर्धाको चिट्ठी' से।