सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/२९६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

 

३१४. शाश्वत द्वन्द्व

एक मित्र लिखते हैं :
आपने 'यंग इंडिया' के ११ अक्तूबर के अंकमें प्रकाशित अपने एक लेख—'अहिंसाकी गुत्थी'—में अत्यन्त ही स्पष्ट और जोरदार ढंगसे लिखा है कि कायरता और अहिंसा दोनों साथ-साथ नहीं रह सकतीं, एक-दूसरीसे बिलकुल मेल नहीं खातीं। आपके कथनमें लेशमात्र भी अस्पष्टता नहीं है। पर मेरा आपसे अनुरोध है कि आप हमें बतलाएँ कि मनुष्य अपने चारित्रिक गठनसे कायरताको किस तरह बिलकुल निकाल फेंक सकता है। में देखता हूँ कि मानव चरित्र उसकी बनी-बनाई आदतोंका कुल योग ही होता है। हम अपनी पुरानी आदतोंको खत्म करके साहस, बुद्धिमत्ता और कर्मकी नई आदतें कैसे डाल सकते हैं? मुझे इसका पूर्ण विश्वास है कि आदतोंको खत्म किया जा सकता है और ज्यादा अच्छी, उच्च स्तरकी ऐसी नई आदतें डाली जा सकती हैं जो मनुष्यको एक सर्वथा भिन्न चरित्र प्रदान कर दें। मुझे लगता है कि आप मानते हैं कि प्रार्थना, शील और अध्ययन-मननके बलपर मनुष्य अपने एक सर्वथा नये रूपको जन्म दे सकता है। क्या आप इनके बारेमें हमें बतलानेकी कृपा करेंगे? 'यंग इंडिया' के किसी अंकमें आप इनके बारेमें अपनी जानकारी और अपना परामर्श अवश्य दीजिए। प्रार्थनाका वह कौन-सा तरीका है और वह कैसे मनुष्यको इसमें समर्थ बनाता है कि वह अपने-आपको एकनये साँचे में ढाल सके? कृपया इसका खुलासा करके हमारी सहायता कीजिए।

यह प्रश्न उस शाश्वत द्वन्द्वसे सम्बन्ध रखता है जिसका 'महाभारत' में इतिहासके नामपर अत्यन्त ही विशद ढंगसे निरूपण किया गया है और जो नित्य ही करोड़ों व्यक्तियोंके हृदयों में निरन्तर चलता रहता है। मनुष्यका निर्दिष्ट लक्ष्य है—पुरानी आदतोंपर विजय पाना और भलाईको सर्वथा उचित स्थानपर बैठानेके लिए अन्दरकी बुराईपर विजय पाना। यदि धर्म हमें यह नहीं सिखाता कि यह विजय कैसे प्राप्त की जाये, तो वह हमें कुछ सिखाता ही नहीं। मनुष्य जीवनका यही सबसे सच्चा उद्यम है, परन्तु इस उद्यम में सफलता पानेका कोई बना-बनाया राज-मार्ग नहीं है। हम भारतीय जिन बुराइयोंसे पीड़ित हैं, उनमें शायद कायरता ही सबसे बड़ी बुराई है, और शायद यही सबसे बड़ी हिंसा है। आम तौरपर रक्तपात आदिको ही हिंसा समझा जाता है, पर यह उससे भी कहीं बड़ी हिंसा है। इसलिए कि यह ईश्वरपर आस्थाके अभाव और उसकी विभूतिके अज्ञानसे ही पैदा होती है। लेकिन खेद है कि मैं कायरता और अन्य बुराइयोंको दूर करनेके तरीकेके बारेमें पत्र लेखक द्वारा अपेक्षित 'जानकारी और सलाह' देनेकी योग्यता अपने में नहीं पाता। परन्तु इतना मैं अपने