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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/३०२

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३१८. उद्धरण : विभिन्न पत्रोंसे[]

हैजा-ग्रस्त उड़ीसा में काम करने के लिए भेजे जानेवाले एक राष्ट्रवादी कार्यकर्ताको उन्होंने लिखा :

हैजासे डरना मत। . . .[१] ठीक सावधानी बरतते रहना। . . .[२] अगर पूरी सावधानीके बाद भी कोई बीमार पड़ जाये, तो लाचारी है। दुनियामें ऐसी कोई जगह नहीं जो इसके खतरेसे बिलकुल खाली हो। . . .[३] लेकिन करना वही तुम्हारा अन्तःकरण जिसकी गवाही दे।

संकल्प-विकल्पोंसे जूझते एक अन्य व्यक्तिको उन्होंने लिखा :

हमें अपने अन्दर मौजूद विकारोंके दशाननको रामकी सहायता से पराजित करना है। यदि रामपर हमारी आस्था हो और हम अपने आपको पूरी तरह उनकी कृपापर छोड़ दें तो सफलता निश्चित है। सबसे बड़ी बात यह है कि आत्मविश्वास मत खोना। स्वादके लोभसे बचना।

एक अन्य व्यक्तिको उन्होंने लिखा :

त्याग-कर्मके रूपमें चरखा कातने और मनोरंजनके लिए चरखा कातनेके बीच जमीन-आसमानका अन्तर है । मैं तो आपको यही सलाह दूंगा कि चरखा कातते समय धार्मिक भावके साथ मौन रखिए। इससे आपको आध्यात्मिक शान्ति मिलेगी और यदि आप कताईके लिए दिनका कोई एक समय नियत कर लेंगे तो आपकी दिनचर्या उसीके अनुसार व्यवस्थित हो जायेगी और आपको जीवन सुव्यवस्थित करनेमें सहायता मिलेगी।

एक दूसरे सज्जनको उन्होंने लिखा :

आपकी माता यदि अनिच्छा दिखायें तो उनपर खादी थोपिए मत। हाँ, यदि खादीपर आपकी आस्था सच्ची और सशक्त है तो उसका प्रभाव पड़ कर रहेगा।

एक अन्य पत्र लेखकको उन्होंने लिखा :

साम्प्रदायिक उपद्रवोंके लिए, मेरे पास जो रामबाण है, उसे सभी जानते हैं। कोई भी एक पक्ष यदि अपने अन्दरसे वैमनस्यको पूरी तरह निकाल फेंके और दूसरे पक्ष द्वारा किये जानेवाले हर अन्यायको धैर्यपूर्वक सहन करता जाये तो निश्चित है कि अन्तमें दोनोंके बीच हार्दिक एकता स्थापित होकर रहेगी। अन्याय समाप्त हो जायेगा और दोनों पक्ष बहादुर बन जायेंगे। आज तो दोनों ही हद दर्जेके बुजदिल बने हुए हैं।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २०-१२-१९२



^ २, ^ ३, व ^ ४. साधन-सूत्र के अनुसार।

  1. प्यारेलालके लेख 'वर्धाकी चिट्ठी' के उपशीर्षक 'छिटपुट अंश' के अन्तर्गत।