- पशु ही रहते हैं। जब 'में' और 'आप' मिलकर 'हम' बन जाते हैं, तब ही हमारे अन्दर दिव्य शक्ति पैदा होती है और इस शक्तिके विकासके प्रक्रमकोही 'सहकारिता' कहा जाता है।
मन्त्री महोदयके इस भाषणके लिए मैं उनको बधाई देता हूँ और मुझे भरोसा कि चरखेके प्रसारमें हैदराबाद राज्य मैसूर राज्यके साथ होड़ लगायेगा। कताईके काममें सहकारिता आसान है और अपरिहार्य भी, यदि हमें खादीको स्थायित्व प्रदान करना है। हाथ-कताईका काम करनेवाली सहकारी समिति एक कपास भण्डारसे शुरू करेगी। भण्डारमें धुननेके लिए जो कपास इकट्ठा किया जायेगा वह बोरोंमें भर कर रखा जायेगा, मशीनसे दबाया हुआ कपास नहीं होगा। शुरू-शुरू में यदि कतैये खुद ही धुननेका काम न करें तो भण्डारकी ओरसे धुनिये भी रखे जायेंगे। उस भण्डारमें जरूरतके सभी औजार, जैसे हाथ-ओटनियाँ, धुनकियाँ, चरखे, इनके फालतू पुर्जे और मरम्मत के लिए औजार वगैरह रहेंगे। भण्डार कपासके वितरण प्राप्त करने और बिक्रीका काम भी करेगा। वह यथास्थित पूनियोंके रूपमें या बिना पूनियाँ बनाये कपासका वितरण करेगा। वह सदस्यों द्वारा काता हुआ सूत नकद दामोंमें खरीद कर उससे बुनी हुई या अन्य स्थानोंसे खरीदी हुई खादी सदस्योंको बेचेगा। वह कताई करनेवाले सदस्योंको रियायती कीमतपर और जनताको आम कीमतपर खादी बेचेगा। यदि ऐसी समितियाँ राज्यके संरक्षणमें खड़ी की जायें और राज्यकी ओरसे उनको पूर्ण या आंशिक सहायता दी जाये तो इस काममें जनताकी ओरसे मनचाहा सहयोग मिलनेकी सम्भावनाएँ हैं। पर इस सबके लिए जरूरी है कि अधिकारियोंमें खादीका चलन हो, ऐसा एक वातावरण तैयार हो जाये; मतलब यह कि अधिकारी लोगोंका हृदय परिवर्तन हो और वे अपने-आपको जनताके शासक और मालिक समझनेकी बजाय उससे सचमुच प्रेम करें और उसके विश्वासपात्र बन जायें। वे यह न समझें कि जनता तो आधे पेट खाकर मेहनत करनेके लिए ही पैदा होती है। यदि वित्तमन्त्री अपने यहाँके अधिकारियोंमें वैसे उत्साहका संचार कर दें जैसा उनके भाषणसे झलकता है तो राज्यकी जनताका भविष्य सचमुच उज्ज्वल हो जायेगा। और फिर हैदराबाद राज्य तो स्वयं कपासका एक विशाल क्षेत्र है, जब कि मैसूर नहीं है।
यंग इंडिया, २०-१२-१९२८