३३०. पत्र : के॰ टी॰ पॉलको
सत्याग्रहाश्रम[१]
साबरमती
२२ दिसम्बर, १९२८
आपका पत्र मिला। मैं कलसे लगभग एक सप्ताहके लिए कलकत्ता रहूँगा। और वहाँ श्री जीवनलाल, ८ प्रिटोरिया स्ट्रीट के साथ ठहरूँगा।
मुझे परिषदकी कार्रवाईका संक्षिप्त विवरण और आपके भाषणका पाठ मिल गया है। भाषण मैं अभीतक पढ़ नहीं पाया हूँ। जैसे ही मुझे समय मिलेगा निःसन्देह मैं उसे पढ़ेगा; और यदि उस विषयमें मुझे कुछ कहना होगा तो खुशीके साथ कहूँगा।
श्री डेविकने[२] आपसे पहले मुझे डा॰ मॉटके बारेमें लिखा था। मैं भी उनसे मिलना चाहूँगा। जनवरी और फरवरीके बीचका मेरा आना-जाना आदि कार्यक्रम कलकत्तेमें तय होगा।
हृदयसे आपका,
५, रसल स्ट्रीट, कलकत्ता
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३८१८ ) की फोटो-नकलसे।
३३१. टिप्पणी
कातने के शौकीनोंके लिए
जिस लेखमें[४] यह सूचित किया गया था कि पींजी जानेवाली रुईको धूप दिखाना जरूरी नहीं है, उसके संदर्भ में श्री लक्ष्मीदास लिखते हैं :[५]
- ↑ स्थायी पता।
- ↑ डेविकको लिखे गये पत्रके लिए देखिए "पत्रः ई॰ सी॰ डेविकको", १२-१२-१९२८।
- ↑ विश्व ईसाई विद्यार्थी सम्मेलनकी प्रबन्धक समितिके अध्यक्ष।
- ↑ देखिए "अच्छी पिंजाई", ९-१२-१९२८।
- ↑ पत्र नहीं दिया गया है। पत्र लेखकने यह लिखा था कि गांधीजीने उक्त लेखपर अपनी टिप्पणी में रुई और कपासका अन्तर नहीं किया। कपासको धूप दिखानेके बाद भी ओटा जा सकता है जब कि ओटे हुए कपासको धूप दिखानेको जरूरत नहीं है। उन्होंने यह भी बताया था कि पूनियां बनाते समय ऐसी ही छड़ी काममें लाई जानी चाहिए जो रेशेकी लम्बाईके बराबर मोटी हो, उसी हालत में कातते समय रेशे पूरे-पूरे निकल सकते हैं।