३३६. पत्र : आश्रमकी बहनोंको
कलकत्ता
मौनवार, २४ दिसम्बर, १९२८
आज मेरे पास एक छोटा-सा पत्र लिख सकने योग्य समय ही है।
मैंने एक पत्र दुर्गाबहनको लिखा है। उसे पढ़ लेना, क्योंकि वह तुम सबपर लागू होता है। तुम सब बहनोंको उमीकी मृत्युसे सबक लेना चाहिए। आश्रमके सारे बच्चे तुम सबके बच्चे हैं। यदि उनमें से किसी की भी मृत्यु हो जाती है तो तुम्हें समझना चाहिए कि उसे ईश्वरने ले लिया है, यदि कोई बच्चा जन्म लेता है तो समझ लेना चाहिए कि भगवानने उसे हमारे बीच भेजा है। आश्रमकी संख्या नवजात शिशुओंके कारण न बढ़े तो नवागन्तुक परिवारोंके कारण थोड़ी बढ़ती ही रहती है। यदि हम उन सबके प्रति समान प्रेम रखना सीख जायें तो हमें उमीके जानेके कारण कष्ट नहीं होगा, क्योंकि हमें ऐसी घटनाओंके गहरे अर्थ समझने की कोशिश तो करनी ही चाहिए।
हम लोग जल्दी ही मिलेंगे।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी° एन° ३६६८) की फोटो-नकलसे।
३३७. पत्र : प्रभावतीको
मौनवार [२४ दिसम्बर, १९२८[१]
तुमारे खत मीले हैं। पिताजी यहीं है। उनका स्वास्थ्य अच्छा है। मैं अब तक मील नहि सका हूं। कुसुमके साथ तुमारा परिचय ठीक हो रहा है जान कर मुझको आनंद होता है।
उनसे कोई चीझ छुपानेकी आवश्यकता नहि है। वह दृढ होनेके कारण ठीक सलाह दे सकती है। सब तुमें भले कहते रहे, किसीकी बीमारी होने पर मुझको लीखते रहो।
बापूके आशीर्वाद
जी° एन° ३३१९ की फोटो नकलसे।
- ↑ “कुसुमके साथ तुम्हारा परिचय ठोक हो रहा है" के उल्लेखसे लगता है कि यह पत्र १९२८ में लिखा गया होगा। इसके अतिरिक्त गांधीजी अखिल भारतीय कांग्रेसके अधिवेशन में भाग लेने कलकत्ता गये हुए थे। वहाँ उन्होंने प्रभावतीके पितासे भेंट होनेकी सम्भावना भी व्यक्त की है।