फल केवल यह होगा कि जनता जाल में फँस जायेगी और जाल में फँसी पड़ी रहेगी। मेहरबानी करके ऐसा करनेकी कोशिश न करिए।
मेरा कहना है कि कोई भी आदमी बड़ी से बड़ी जिस चीजकी कामना कर सकता है वह है स्वतन्त्रता। वह कामना इस प्रस्तावके द्वारा पूरी हो जाती है। मद्रासके प्रस्ताव में कांग्रेसका उद्देश्य दिया गया है। उसमें कहा गया है कि हमारा उद्देश्य स्वतन्त्रता होगा किन्तु उसमें स्वतन्त्रताकी घोषणा नहीं की गई है। उक्त प्रस्तावको तैयार करनेवालोंके मनमें जिस प्रकारकी स्वतन्त्रताका चित्र था हम इस समय उसे पानेके लिए कोई प्रयत्न नहीं कर रहे हैं। वैसे हम एक प्रकारसे स्वतन्त्रता पानेका प्रयत्न कर रहे हैं। कांग्रेसका उद्देश्य स्वतन्त्रता है, अगर कोई इस बातसे इनकार करना चाहता हो तो वह सामने आये। विकासकी प्रक्रिया ही यह है। किन्तु हममें से कुछ लोगोंका विचार है कि कांग्रेसके उस प्रस्तावमें स्वराज्य अथवा स्वतन्त्रता शब्द डाल दिया जाये ताकि हम उसे देशके सामने रख सकें। बड़ी खुशीसे आप ऐसा कर सकते हैं। आप उक्त शब्दका उसमें समावेश कर सकते हैं; किन्तु इस प्रस्तावको पास करते समय मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि कामको अन्जाम देनेकी प्रक्रियामें ही स्वराज्यकी गति बढ़ती है, कम नहीं होती। मद्रासमें आपने जो उद्देश्य निश्चित किया था, उसे निश्चित करके सो जाना सम्भव था । किन्तु यह जो प्रस्ताव है वह आपको आपके उद्देश्यके प्रति बेखबर नहीं रहने देगा; क्योंकि इसके अनुसार दो वर्ष में आपको स्वराज्यकी रूपरेखा बना लेनी पड़ेगी और तब लगभग उसका यह अर्थ होगा कि आपने स्वतन्त्रताकी घोषणा कर दी। अगर दो वर्षतक हममें से कुछ लोग जीवित रहे, मैं अपनेको भी गिन कर कहता हूँ कि अगर मैं भी दो वर्षतक जीवित रहा, तो सम्भव है कि मुझे और आपको स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके लिए बहुत-कुछ करके दिखाना पड़े और यह भी सम्भव है कि हमें उसे प्राप्त करनेके अपने में से कुछकी लाशें देखनी पड़ें। परिपूर्णसे परिपूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त करनेकी इच्छामें मैं किसीसे पीछे नहीं हूँ। यदि मेरी अथवा देशकी स्वतन्त्रतामें बाधा डालनेके लिए एक भी आदमी बच जाता है तो मुझे चैन नहीं पड़ सकता और मुझे लगेगा कि मैं व्यर्थ ही जीवन बिता रहा हूँ। मेरी छाती में स्वतन्त्रताकी आग उसी प्रकार धधक रही है, जिस तरह अधिक से अधिक उग्र किसी आदमीके वक्षमें, किन्तु उसे प्राप्त करनेके तरीके भिन्न हो सकते हैं। बहुत सम्भव है कि जब मैं अपने जीवनके दिन समाप्त करने जा रहा होऊँ तब भी मुझे यह सुन पड़े कि 'अभी हमें स्वराज्यके लिए ५० वर्ष और रुकना पड़ेगा।' सम्भव है उस परिस्थितिमें आप तर्जनी उठा कर मुझसे कहें कि तुम अब बिलकुल कमजोर हो गये हो! तब आप मेरी कोई बात नहीं सुनेंगे और मुझे कांग्रेसके रंगमंचसे नीचे उतार देंगे और मैं भी राष्ट्रकी सेवा करने में अपने-आपको अयोग्य समझने लगूंगा क्योंकि मैं राष्ट्रकी सेवामें अपनी दुर्बलता नहीं अपनी शक्ति लगाना चाहता हूँ, चाहे वह जितनी थोड़ी ही क्यों नहो। अपनी कमजोरीका हिसाब तो मैं शिष्टताके साथ दूंगा, जहाँतक शक्तिका सवाल है, वह सारीकी सारी आपको समर्पित है। एक क्षणके लिए भी ऐसा मत समझिए