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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/३२८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय


इसे अशुभ लक्षणके अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। कोई निरपराध धनी पुरुष तीर्थ-यात्राके लिए निकला हो और दान देनेके लिए अपने साथ पर्याप्त धन लेकर चला हो, और यदि उसे कोई जाकर लूट ले और फिर उसका खून कर डाले तो इसको बहादुरी नहीं कह सकते। इसी तरह छिपकर उस निरपराध पुलिस अफसरका खून करनेमें भी कोई बहादुरी नहीं है; क्योंकि वह अफसर तो अपना फर्ज अदा कर रहा था, भले ही उसका यह काम खून करनेवालेकी जातिके लिए कितना ही बुरा साबित क्यों न हो। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि पहले भी ऐसे कितने ही खून किये गये हैं, फिर भी हमारे वर्तमान शासकगण अपनी शासन-पद्धतिको जारी रखने में सफल हो ही रहे हैं । और ब्रिटिश साम्राज्यके निर्माणका इतिहास भी क्या ऐसी शूरवीरता, साहस और इससे अच्छे कामोंपर किये गये बलिदानोंसे खाली है? यदि हम श्री सांडर्सके इस खूनको कोई बहादुरीका काम मानें तो अंग्रेज लोग, मेरा खयाल है, इसके जवाब में एक नहीं सैकड़ों ऐसे बहादुरीके कार्य करके दिखा सकते हैं। पर मेरी रायमें वह समय आ गया है जब हम अपनी-अपनी जातियों या राष्ट्रोंके भेदोंको छोड़कर ऐसे कार्योंपर, फिर चाहे वे कितने ही साहसके हों पर जो संकीर्ण मनोवृत्तिसे किये गये हों, अथवा जिनका फल और भी संकीर्ण निकला हो, दुःखित हृदयसे घृणा और नापसंदगी प्रकट करें। हाँ, मैं जानता हूँ कि ऐसा करनेके मानी होंगे बहादुरी, देशभक्ति, धार्मिकता तथा ऐसे ही दूसरे शब्दोंको नये मूल्य देना। मेरा खयाल है कि राष्ट्रपति क्लीवलैंड[] और कारनोटके[] खूनके लिए कोई आदमी उन खूनियोंको भला नहीं कहता और न उन राष्ट्रोंकी बड़ाई करता है जिनके हितके लिए उन पागल व्यक्तियोंने ये बुरे काम किये। इस्लाममें खलीफाओंके इतने तमाम खून और यदि ताजी मिसाल लें तो स्वामी श्रद्धानन्दजीका जो खून हुआ है, उसके कारण इस्लामकी कोई बड़ाई नहीं करता। और न गोरक्षक कहलानेवाले हिन्दुओंके जिन पागल कृत्योंका वर्णन हम नित्य अखबारोंमें पढ़ते रहते हैं, उनकी बदौलत हिन्दू धर्मकी उच्चता बढ़ी है। सच तो यह है कि खून तथा इससे मिलते-जुलते दूसरे दुष्कृत्योंके कलंकसे मनुष्य-जाति, धर्म और सच्ची सभ्यता किसीकी वृद्धि नहीं होती।

भारतवर्षके नवयुवकोंको यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि लालाजीकी मृत्युका बदला भारतको आजादी दिलाकर ही चुकाया जा सकता है। किसी भी राष्ट्रको स्वतन्त्रता एक आदमीके सच्ची वीरताके कार्योंसे भी कभी नहीं मिल सकती, फिर नाम मात्रकी वीरताकी तो बात ही क्या? स्वतन्त्रता देवीके मन्दिरके लिए हजारों लाखों नर-नारियों और युवा वृद्धोंके धैर्य और बुद्धिसे युक्त रचनात्मक उद्योगोंकी आवश्यकता है। ऐसे कार्य जिनकी कि हम आज निन्दा कर रहे हैं, शान्त रचना प्रक कार्योकी प्रगतिको निश्चित रूप से पीछे हटाते हैं। और कुछ नहीं तो वह उन

 
  1. १८३७-१९०८ : संयुक्त राज्य अमेरिकाके राष्ट्रपति।
  2. १८३७-१८९४: फ्रांसीसी गणतन्त्रके चौथे राष्ट्रपति।