सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/३३१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

 

३४४. बम्बईके लिए दूध

एक मित्रने 'बम्बईका कलंक' शीर्षक लेख (२९ नवम्बरके) 'यंग इंडिया' में पढ़ने के बाद महादेवभाईको यह पत्र लिखा है :[]

मुझे भय है कि इस पत्रके लेखकने उक्त लेखको ठीक-ठीक नहीं समझा है। यह किसीने नहीं कहा कि बम्बई में पशु वधका प्रश्न अथवा शहरको साफ दूध देनेका प्रश्न पशुशालाओंको बम्बई शहरसे हटा कर बम्बईके उपनगरोंमें ले जानेसे हल हो जायेगा। जरूरत इस बातकी है और कहा भी यहीं गया है कि बम्बईके लोगोंको इस समस्याका सामना वीरतासे करना चाहिए और उनके लिए ऐसा करना ही उचित है। निश्चय ही जो गुजराती बम्बई में नहीं रहते, वे उन दानियोंमें नहीं हैं जिनसे बम्बईकी सहायताकी और उसकी एक विशाल और उतनी ही आवश्यक समस्याको हल करनेकी आशा की जा सकती है। बम्बई नगरपालिकाको इस मामलेमें पहल और कार्रवाई करनी चाहिए और जरूरत हो तो जिन गुजरातियोंकी प्रवृति ऐसे उपकारके कामोंमें हो, उनकी सहानुभूति और उनका सहयोग प्राप्त करना चाहिए। यदि कोई बम्बईसे बाहरका व्यक्ति इस मामलेमें भाग लेना चाहे तो मुझे भय है कि उसको भी बम्बई निगमसे विशेष सुविधाएँ लेनेकी जरूरत होगी। किन्तु इस देशमें व्यक्तिगत बड़े-बड़े उद्योगोंको प्रारम्भ करनेका सामर्थ्य नहीं है। यहाँ बड़े उद्योगमें आनेवाले भारी जोखिमोंको उठानेवाले लोग नहीं हैं और बम्बई जैसे बड़े शहरको दूध पहुँचानेका काम निस्सन्देह एक बड़ा काम है। यह बात भी मालूम होनी चाहिए कि ऐसा व्यक्तिगत प्रयत्न बम्बईमें पहले किया जा चुका है और असफल हो चुका है। मेरा ख्याल है कि इस असफलताके निश्चित कारण हैं। उस साहसिक प्रयत्नके पीछे पर्याप्त लगन और योग्यता नहीं थी। किन्तु मेरा कहना यह है कि बम्बई नगरपालिका अपने नागरिकोंको सस्ता और शुद्ध दूध देनेके लिए और बम्बईको पशुशालाओंसे मुक्त करनेके लिए जितना खर्च करे और जितना जोखिम ले, उतना कम है। शहरके लोगोंके स्वास्थ्यके लिए बम्बईकी ये पशुशालाएँ एक निरन्तर खतरेकी चीज हैं और बम्बईमें मलेरिया और दूसरी फैली हुई बीमारियोंको जड़से मिटानेके उपायोंमें सदा बाधक होंगी। मैं बिना किसी झिझकके स्वीकार करता हूँ कि एक बड़ी दुग्ध योजना चलानेके लिए बम्बईको अपने क्षेत्रसे बाहर जाना होगा। किन्तु संसारके हरेक शहरने अपनी कई जरूरतोंको पूरा करनेके लिए ऐसा किया है।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २७-१२-१९२८
 
  1. यहाँ नहीं दिया जा रहा है।