श्री ससांबमूर्तिको इस बातपर आश्चर्य है कि पण्डित जवाहरलाल नेहरू आज यहाँ क्यों नहीं हैं। उनका यह आश्चर्य ठीक ही है। मैं आपको असल बात बता देना चाहता हूँ। जैसा कि उन्होंने शुरूमें ही कहा था वे, जो कुछ हमारे बीच हो रहा है, उससे बिलकुल सहमत नहीं हैं। वे इस जुएको उतार फेंकनेको बेचैन हैं। अपने जीवनमें चौबीसों घंटे वे अपने देशवासियोंके कष्टोंकी ही चिन्ता करते रहते हैं। जनताको पीस डालनेवाली इस दरिद्रताको मिटानेके लिए वे उतावले हो रहे हैं। जिस तरह इस देशपर शासन करनेवाले और लॉर्ड सेलिसबरीके शब्दोंमें इस देशका शोषण करनेवाले और खून चूसनेवाले बाहरी पूँजीपतियोंके विरुद्ध हैं, उसी तरह वे जन-साधारणका शोषण करनेवाले इस देशके पूँजीपतियोंके भी विरुद्ध हैं। मैं आपको यह बात साफ-साफ बता देना चाहता हूँ कि आपकी अनुमति मिलनेपर उस प्रस्तावको वापस लेकर मैं जो नया प्रस्ताव रखना चाहता हूँ, वे उससे भी सहमत नहीं हैं। उनका ख्याल है कि जो कुछ वे चाहते हैं, यह प्रस्ताव उससे बहुत कम है। परन्तु उदाराशय होनेके कारण वे अनावश्यक कटुता पैदा करना नहीं चाहते। वैसे यदि आवश्यक हो तो वे कटुता और उससे भी अधिक किसी परिस्थितिका सामना करनेको तैयार हैं। इस स्थितिमें से निकलनेका उन्हें एक ही मार्ग दिखाई देता है कि वे मौन रहें और सभामें उपस्थित न हों। इसीलिए आप देखते हैं कि यद्यपि वे कांग्रेसके मन्त्री, एक निष्ठावान और कर्मठ मन्त्री हैं, फिर भी उन्होंने उस सारी कार्यवाहीका, जिससे वे सहमत नहीं हैं, एक असहाय दर्शक बननेकी अपेक्षा यह ज्यादा अच्छा समझा कि वे आज सबेरेकी इस बैठक में उपस्थित ही न हों। मुझे इसका दुःख है, क्योंकि जहाँ मैं अपने देशकी दरिद्रता और गुलामीपर, जो हमें पीसे डाल रही है, उनके इस सारे दुःखमें, इस गहरी व्यथामें, उनके साथ हूँ, वहाँ इस प्रस्तावपर उनके असन्तोषमें उनके साथ नहीं हूँ। मैं उनके इस विश्वाससे सहमत नहीं हूँ कि जो कुछ हम इस समय कर रहे हैं, वह देशकी आजकी जरूरतोंके लिए काफी नहीं है। पर वे असन्तोष अनुभव किये बिना कैसे रह सकते हैं? अपने मार्गपर बढ़ते हुए यदि उन्होंने अपने लिए कोई बिलकुल अनोखी और मौलिक राह नहीं निकाली तो वे जवाहरलाल ही क्या हुए। उन्हें किसीकी चिन्ता नहीं है, अपने पिता, अपनी पत्नी, अपनी बच्ची तककी चिन्ता नहीं है। उन्हें अपने देश और उसके प्रति अपने कर्त्तव्यकी चिन्ताको छोड़कर और किसी चीजकी चिन्ता नहीं है।
अब आप यह समझ सकेंगे कि वे क्यों अनुपस्थित हैं, शायद आप यह भी समझ सकेंगे कि जो प्रस्ताव मैंने पेश किया था उसे वापस लेनेका दुःखदायी कर्त्तव्य मुझे क्यों करना पड़ रहा है। मैं उसे इसलिए वापस नहीं ले रहा हूँ कि मुझे उस प्रस्तावको पेश करनेका खेद है, या मुझे वह प्रस्ताव प्रिय नहीं है, या जो प्रस्ताव मैं अब पेश करने जा रहा हूँ वह उससे किसी भी रूपमें अच्छा है। मेरी तो यह धारणा है कि इस प्रस्तावसे जो अब मेरे हाथमें है, वह कहीं अच्छा था। परन्तु, जैसा कि मैं कह चुका हूँ, हमारा जीवन उत्पीड़नकारी वातावरणके विरुद्ध एक निरन्तर संघर्ष है और हमारी अपनी पाँतोंके बीच एक निरन्तर संघर्ष चल रहा है। यदि हम