एकता चाहते हैं तो हमें विभिन्न मतोंमें सामंजस्य और तालमेल बैठाना होगा और कई ऐसे समझौते करने होंगे जो दोनों पक्षोंके लिए सम्मानजनक हों। हम हर मौके पर किसी पवित्र सिद्धान्तके महत्त्वकी बात ले बैठते हैं और मानते हैं कि उसका एक कण भी छोड़ा नहीं जा सकता। बहुत-सी चीजें जिन्हें हम सिद्धान्तका नाम दे देते हैं दरअसल सिर्फ तफसीलें होती हैं और सिद्धान्त नहीं कही जा सकतीं। इसलिए यह प्रस्ताव इस सभाके सभी पक्षों, या उस प्रस्ताव और उसके मुख्य संशोधनोंके समर्थक पक्षोंकी कोशिशोंका फल है। यह उनके आपसी समझौतेका, उनकी पारस्परिक सहमति और परस्पर तालमेलका प्रस्ताव है। इसीलिए उस प्रस्तावको वापस लेनेकी अनुमति माँगते हुए मुझे ऐसा महसूस नहीं होता कि मैं कोई अनुचित काम कर रहा हूँ, यद्यपि मैं उसे इस प्रस्तावसे, जो मैं अभी आपके सामने पेश करनेवाला हूँ, कहीं अच्छा मानता हूँ। क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि इस प्रस्तावसे जो मुझे पहले के प्रस्तावसे बहुत घटिया लगता है, हमारा राष्ट्रीय हित ज्यादा अच्छी तरह सिद्ध होगा, क्योंकि यह सभी पक्षोंको एक सूत्रमें रखेगा। जिस तरह मैं या पण्डित मोतीलाल इस सभा में मतभेद पैदा करना नहीं चाहते, उसी तरह वे लोग भी ऐसा नहीं चाहते। यदि हम दोनों यह सोचकर कि जीत हमारी होगी, मतभेद पैदा करना चाहते, तो उस जीतसे जो कटुताको बढ़ाती और जो हमारी राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय शक्तियोंको और कमजोर करती, क्या लाभ होता?
मेरे उस मूल प्रस्तावके पीछे तीन-चार व्यक्ति नहीं, बल्कि दो पक्ष थे और पण्डित जवाहरलालका मुख्य संशोधन तक एक समझौता था। वह भी जो कुछ उन्हें प्रिय था, उससे बहुत कम था। पर उन्होंने कहा, "यदि मैं देशके सभी विभिन्न तत्त्वोंको एक सूत्रमें रख सकूं तो मैं अपना विरोध छोड़ दूंगा और इस प्रस्तावको पेश करूँगा।" इस तरह आप यह देख सकते हैं कि इस प्रस्तावकी तरह वह प्रस्ताव भी एक समझौता था। इसलिए इतनेपर भी यदि आप यह सोचते हैं कि आप उत्तरदायित्व लेने को तैयार हैं और देशका हित मुझे उस प्रस्तावको वापस लेनेकी अनुमति न देनेसे ज्यादा अच्छी तरह सिद्ध होगा, तो निश्चय ही आप उत्तरदायित्व ले सकते हैं। पर आप उसका क्या अर्थ है, यह याद रखें । अब मैं यह मामला आपके हाथों में छोड़ता हूँ।[१] (तालियाँ)
हमारे बीच आज कुछ लोग ऐसे हैं जो कहीं भी रुकने को तैयार नहीं हैं, जिन्हें अपनी उतावलीमें सीधे सर्वनाशकी तरफ दौड़ने में भी झिझक नहीं है। ऐसे में हम क्या करें? मेरे जैसा आदमी जिसका अन्त निकट है, ऐसे में क्या करे? देशके उन वीरोंसे, जिन्हें उसकी आजादी अगर ज्यादा नहीं तो उतनी ही प्यारी जरूर है जितनी मुझे है, मैं क्या कहूँ? इस बारेमें मैं उनसे क्या कहूँ? क्या मैं उनसे यह कहूँ कि मैं अब तुम्हारे साथ नहीं चलूंगा, क्योंकि मेरी समझमें मेरा सिद्धान्त ज्यादा अच्छा है, मेरा तरीका ज्यादा अच्छा है, इसलिए तुम अपना भविष्य अपने
- ↑ यहाँ एक सदस्यने यह आपत्ति उठाई कि उस प्रस्तावको वापस लेते हुए महात्मा गांधीको भाषणकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
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