जो कुछ कहा उसका सार है। इसलिए आपको यह बात थोड़ी सावधानीके साथ ग्रहण करनी है। मैंने उनसे कहा कि मैं इसकी सफाई दूंगा; ये मेरे प्यारे सहयोगी हैं और इनके लिए मेरे मनमें थोड़ा-बहुत नहीं, बहुत अधिक प्रेम है। उन्होंने कहा : "मेरे सिरपर काँटोंका यह ताज रखने में आपका हाथ रहा है। इसलिए अब आपको आकर यह देखना होगा कि उस काँटोंके ताजसे मेरे सिरपर कितनी खरोंचें आई हैं। उनमें से कुछ खरोंचों में आपको हिस्सा भी बँटाना होगा।" देशके इतिहासकी इस नाजुक घड़ी में भाग लेनेके लिए आग्रह करनेके बाद, यदि मैं उनके इस आह्वानका उत्तर न देता तो मैं मित्रताको तोड़ने और राष्ट्रके प्रति अपने कर्त्तव्यसे च्युत होनेका दोषी होता। इसलिए मैंने कहा : "जो भी दिन आप निश्चित कर देंगे उसी दिन मैं आऊँगा और जिस दिन आप कहेंगे उसी दिन वापस जाऊँगा। (तालियाँ) अब आप यह समझ सकते हैं कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ और यह भी समझ सकते हैं। कि यद्यपि यह प्रस्ताव आपसी समझौतेके आधारपर तैयार किया गया है और मूल प्रस्तावसे कमजोर है, फिर भी मैं इसे कितना महत्त्व देता हूँ।
अब मैं वाइसराय सम्बन्धी इस धारापर आता हूँ। यह धारा उस प्रस्तावकी उसी तरह आवश्यक परिणति थी, जैसे कि वह इस प्रस्तावकी आवश्यक परिणति है। यह प्रस्ताव सच कहें तो मुकुटहीन हो गया है; पर हम आजकल, मनोविज्ञानमें जिसे हीन भावना कहते हैं, उसके शिकार हैं। हर पाँच मिनिटपर हमें राजा चार्ल्सका सिर अपनी आँखोंके आगे झूलता नजर आता है। आपको सुप्रसिद्ध श्री डिककी बातका पता है जो राजा चार्ल्सके सिरकी कल्पना किये बिना कोई बात सोच ही नहीं सकते थे। इसी तरहकी हीन भावना हमारे दिमागों और मनोंमें अंकित है। वह सिर बराबर हमारे आगे झूलता रहता है और हमें चिन्तासे मारे डाल रहा है। वह हमें हर चीज में नजर आता है और आशंका होती है कि हम कहीं अपने आपको कमजोर न बना डालें। इसलिए अब हम अपने आपको मजबूत बना रहे हैं। जैसा कि कुछ पत्रोंने कहा, वह अन्तिम चेतावनी है। पर वास्तवमें वह शिष्टताका तकाजा भी था। ब्रिटिश राष्ट्रके सम्मानके संरक्षकोंसे मेरी यह अपेक्षा है कि वे इस प्रस्तावके गूढ़ार्थको समझें ; मैं चाहता हूँ कि वे राष्ट्रकी आकांक्षाओंको समझें, और इसीलिए मैं उनके पास इस प्रस्तावको भेजनेका नाजुक काम कर रहा हूँ। वे इसका जो भी चाहें करें। यह सब जो किया जा रहा है, मैं उसका अर्थ समझता हूँ।
लेकिन मैं उन्हें यह कहनेका मौका देना नहीं चाहता कि 'हमें इस प्रस्तावके बारेमें कुछ पता ही नहीं था।'
आप इस विषय में यह समझने की कोई भूल न करें कि यह सर्वदलीय संविधान ब्रिटिश राष्ट्रके सम्मुख विचारार्थ रखी जानेवाली कोई माँग है। पर आप इस खयाल में भी न रहें कि यह कोई ऐसा दस्तावेज है जिसपर उन्हें कभी विचार नहीं करना है। यह साइमन कमीशनके सामने पेश की जानेवाली कोई चीज न होकर एक ऐसा दस्तावेज है जिसपर ब्रिटिश सरकार, साम्राज्य सरकार वाइसराय और उन लोगोंको जो आज भारतके भाग्य-विधाता समझे जाते हैं, विचार करना होगा। यह इसीलिए बनाया