गया है। मैं तो कहता हूँ कि जिस रूप में हम इसे ले रहे हैं उस रूपमें यह स्वाधीनताका अधिकारपत्र भी है। मित्रो, मेरा खयाल है कि मैंने आपको औपनिवेशिक दर्जे और स्वाधीनतामें भेद करनेसे रोका था। मैं इसे स्वाधीनता कहता हूँ। कल रात मुझे यह कहना पड़ा कि 'भगवानके लिए इस दस्तावेजसे मत हटिए' और न आप इस दस्तावेजसे हटनेकी बात सोच सकते हैं। यह एक पवित्र दस्तावेज है। इससे अधिक या इससे कम कुछ भी नहीं। और यदि यह एक पवित्र दस्तावेज है तो आप इससे हट नहीं सकते। यदि आपको इसमें से एक विराम चिन्ह भी निकालनेकी जरूरत पड़े तो आपको उसपर विचार करनेके लिए सम्मेलन और कांग्रेसका एक विशेष अधिवेशन बुलाना होगा। पर इस दस्तावेजको यह पवित्र रूप देनेका अर्थ यह नहीं है कि इसे एक तिजोरी में बन्द करके रखना है। यह एक ऐसा दस्तावेज है जिसका प्रचार होना चाहिए और जिसे सबसे पहले राज-प्रतिनिधियोंके पास भेजना चाहिए। उन्हें यह कहनेका मौका मत दीजिए कि आपने इसे हमारे पास विचारार्थ नहीं भेजा। यदि यह अन्तिम चेतावनी थी तो भी आपको इसे हमारे पास भेजना चाहिए था।[१]
बारडोलीके मामले में मैंने ऐसा ही किया था। मैंने वाइसरायको एक पत्र लिखा, पर उसके बाद चौबीस घंटे के अन्दर ही मुझे उसे वापस लेने और नया रूप देनेका दुःखदायी कर्त्तव्य पूरा करना पड़ा, क्योंकि बादकी घटनाओंके[२] कारण मैंने वैसा करना आवश्यक समझा। यदि मैं हीन भावनाके रोगसे ग्रस्त होता तो मैं प्रेस-प्रतिनिधियोंके आगे एक वक्तव्य दे देता और वाइसरायसे उत्तरकी अपेक्षा करता। पर मैंने सही तरीका अपनाया। इसी तरह इस प्रस्तावके बारेमें भी मैं सही तरीका अपनाना चाहता हूँ। क्योंकी तब यदि आप कोई कार्रवाई करेंगे तो आपका पक्ष कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत होगा।
मैं यह बात फिर दोहराना चाहता हूँ कि नेहरू रिपोर्टका यदि कोई परिणाम निकलना है तो उसपर ब्रिटिश संसद और वाइसरायको विचार करना होगा। नेहरू रिपोर्टके रचयिता यह जानते थे। आप इसे जानते हैं और मैं भी इसे जानता हूँ। इस बातको स्वीकार न करना दुर्बलताका चिन्ह होगा, एक अशोभन बात होगी। यदि वाइसराय अपने राजा और राष्ट्रके एक योग्य प्रतिनिधि हैं, तो वे इस प्रस्तावपर विचार करेंगे ही, यद्यपि इसमें वह धारा शामिल नहीं है जो मैं इसमें जोड़ना चाहता था। परन्तु यदि वे मेरे शब्दोंको, जिनसे मैं उन्हें अवगत कर रहा हूँ, पढ़नेका कष्ट करें तो मैं इस मंचसे यह घोषणा करता हूँ कि उनके लिए इस प्रस्तावपर गम्भीरतासे विचार करना और यह समझ लेना ठीक रहेगा कि हममें कमसे कम कुछ लोग ऐसे जरूर हैं जो इसके प्रत्येक शब्दका पालन करना चाहते हैं। (साधुवाद) अगर आप साधुवाद देते हैं तो मैं कहता हूँ कि आप इसमें वाइसरायको भेजनेकी वह धारा फिर जोड़ दें। ("नहीं, नहीं" की आवाजें) अगर आप 'नहीं' कहते हैं तो मेरा