३५३. नाम महत्त्वपूर्ण नहीं है
२९ दिसम्बर, १९२८
यह लिखते समयतक (२९वीं दिसम्बरको प्रातःकाल) कांग्रेसका जो प्रभाव मनपर पड़ा है उसके विषय में कुछ कहना जल्दबाजी होगी। घटनाएँ इतनी तीव्रताके साथ घटित हो रही हैं कि सवेरेकी मनपर पड़ी छाप शामतक पुंछ जाती हैं। इसलिए तबतक 'डोमीनियन स्टेटस'–'औपनिवेशिक स्वराज्य और 'इंडिपेंडेन्स' अर्थात् स्वतन्त्रताकी जो चर्चा उठ खड़ी हुई है, हम उसे ही समझ लें। जैसे-जैसे इस चर्चाको छेड़नेवालोंकी दलीलें सुनता हूँ, वैसे-वैसे उससे हो रहा नुकसान ही मुझे ज्यादा ज्यादा स्पष्ट दीख पड़ता है। एक सीमातक यह चर्चा सम्भवतः हितकारी और आवश्यक कही जा सके। निःसन्देह इतना समझ लेना तो जरूरी था कि देशका आदर्श 'इंडिपेंडेन्स' से कम हो ही नहीं सकता और हम जो भी कदम बढ़ायें वह इसी आदर्शकी तरफ होना चाहिए। अतः निष्कर्ष यही निकलता है कि यदि किसी भावी परिवर्तन से देशकी स्वतन्त्रतामें बाधा पड़ती हो तो उसका त्याग आवश्यक है।
लेकिन इस 'स्वतन्त्रता' का अर्थ क्या है? मैं इसका अर्थ स्वराज्य करता हूँ। 'इंडिपेंडेन्स' शब्दका उपयोग हम यूरोपीयोंको ध्यान में रखकर करते हैं। लेकिन जिनकी आँखें देशसे बाहर कहीं लगी होती हैं फिर वह पश्चिम हो या पूर्व, उत्तर हो या दक्षिण, वे जो कुछ कहते हैं वह और कुछ भी क्यों न हो, भारतकी स्वतन्त्रता नहीं है। भारतकी स्वतन्त्रताके लिए तो हमें भारतकी ही तरफ देखना चाहिए; उसकी सन्तान, उसकी आवश्यकता, उसकी सामर्थ्य आदि सब बातोंका विचार करना चाहिए। अतः यह स्पष्ट है कि भारतके स्वातन्त्र्यका अर्थ, उसकी बदलती हुई जरूरतों और बढ़ती हुई शक्तियोंके परिमाणमें बदलता रहना चाहिए। यानी भारतमें स्वतन्त्रताका अर्थ वही नहीं किया जाना चाहिए जो पश्चिममें किया जाता है, इटलीका स्वातन्त्र्य इंग्लैंडके स्वातन्त्र्यसे जुदा होगा और स्वीडनका इन दोनोंसे भी भिन्न होगा।
हमें एक चीजकी जरूरत है और अवश्य ही वह यह है कि हर तरहका ब्रिटिश अंकुश देश परसे उठ जाये लेकिन साथ ही यह भी आवश्यक है कि उस अंकुशके उठ जानेपर किसी दूसरे देशका अंकुश कायम न हो जाये। नेहरू रिपोर्ट इस प्रकारकी स्वतन्त्रताका मार्ग बताती हैं और ऐसा उपाय भी बतलाती है जिसे भारत आज आत्मसात् कर सकता है। अगर उसका अर्थ इससे थोड़ा भी कम हो तब तो वह एक निरर्थक कागज है। इस रिपोर्टको स्वीकार कर लेनेसे देशकी स्वतन्त्रताके आदर्शमें बाधा नहीं पड़ती। और मेरे विचारमें राष्ट्रीय स्वातन्त्र्यका कट्टरसे-कट्टर हिमायती भी इस रिपोर्टके सम्पूर्ण पालनके लिए काम कर सकता है; ऐसा करना उसका धर्म है। रिपोर्ट कोई ध्येय नहीं है। वह तो ध्येय प्राप्त करनेका एक मन्त्र बतलाती है जिसे ध्यानमें रखकर हमें काम करना है। इस रिपोर्टको सफल बनाने के लिए हरएक दलका जमकर और लगातार काम करते रहना जरूरी है।