३५४. पत्र : छगनलाल जोशीको
शनिवार, २९ दिसम्बर, १९२८
आज थोड़ा अवकाश है, इसलिए यह पत्र लिख रहा हूँ। कामकी भीड़ और जागरणके बावजूद तबीयत ठीक रही है।
गंगाबहन से कहना कि पूरी तरह आराम करे और काम हाथमें लेनेकी जल्दी न करे। शंकरभाईसे[१] कहना कि उन्हें पाखाने में घंटे-भर हरगिज नहीं बैठना चाहिए। जोर तो जरा भी न लगायें। खुराकमें फेरफार करके अथवा फिर बाहर जाकर तबीयत सुधार लेनी चाहिए। पिताके लिए जैसी रोटी चाहिए वैसी कमला[२] बना दे तो ठीक है; अलगसे रसोई करना शोभा नहीं देता। हमें कठिनाइयोंको पार करते हुए संयुक्त रसोई-घर चलाना सीखना है। इस प्रयोगको एक वर्षतक निभानेकी हमने प्रतिज्ञा की है। इसलिए मैं मानता हूँ कि उसमें फेरफार नहीं करना है।
आशा है कि मैं दो या तीन तारीखको यहाँसे चला जाऊँगा। ख्याल है कि वहाँ ११ तारीखसे पहले पहुँच पाऊँगा। मीराबहन कल यहाँ आयेगी और यहींसे बिहार जायेगी।
बाकी मिलनेपर या फिर लिखूंगा।
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो : श्री छगनलाल जोशीने