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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/३६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
इस प्रकार वे बाहरी छावाके पीछे भागते हैं, लेकिन आन्तरिक सारकी उपेक्षा कर देते हैं। जब मनुष्य वासना, भ्रान्ति और अज्ञान की क्रीत दासताके स्वेच्छासे स्वीकार किये गये बन्धन तोड़ देगा, तब हर तरह के बाहरी बन्धन अपने-आप टूट जायेंगे और सारा उत्पीड़न स्वयं समाप्त हो जायेगा।

इसलिए हम एक क्षण-विशेषमें जितनी बाह्य स्वतन्त्रता प्राप्त करेंगे वह ठीक उस क्षणतक प्राप्त की गई हमारी आन्तरिक स्वतन्त्रताके बराबर ही होगी। और यदि स्वतन्त्रताका यह दृष्टिकोण सही हो, तो हमें अपनी असली शक्ति अपना आन्तरिक सुधार करने में ही लगानी चाहिए। इच्छा रखनेवाले सभी लोग इस अत्यावश्यक कार्यमें समान रूपसे भाग ले सकते हैं। इस महान प्रयत्नमें भाग लेनेके लिए हमें न वकील होने की जरूरत है और न विधायक बननेकी। जब यह सुधार राष्ट्रीय पैमानेपर सम्पन्न हो जायेगा, तब कोई भी बाहरी ताकत हमारी प्रगति नहीं रोक सकेगी।

[अंग्रेजीसे]

यंग इंडिया, १-११-१९२८

३. दस वर्षों में?

इस पत्रके पिछले अंकों में प्रकाशित प्रोफेसर सी॰ एन॰ वकीलके शिक्षाप्रद लेख[] भारतकी गरीबीके सम्बन्धमें हालमें प्रकाशित उनकी लेख-मालाके[] पूरक हैं और इन्हें उस मालाके साथ रखकर पढ़ना चाहिए। उन्होंने उसी मालासे सम्बन्धित एक लेख और भेजा था, जिसमें गरीबी दूर करनेके उपाय सुझाये थे। लेकिन मैंने उस लेखको रोक लेनेकी धृष्टताकी, क्योंकि उसमें उपायोंका स्पष्ट और निश्चित निरूपण नहीं किया गया था। फिर उन्हें इसे अधिक ठोस उपाय सुझाते हुए नये सिरेसे लिखनेको राजी किया; और उन्होंने उपर्युक्त चार लेखोंमें उन उपायोंका विस्तारपूर्वक निरूपण किया है। मैं नहीं समझता कि विद्वान प्रोफेसरने जो कार्यक्रम तैयार किया है, उसे दस वर्ष में पूरा किया जा सकता है। स्थितिको सुधारनेके लिए ऐसा कोई भी कार्यक्रम सुझा पाना शायद असम्भव है, जिसे दस वर्षके अन्दर इस पूरे देश में, जो इतना विशाल और इतना निर्धन है, लागू किया जा सकता हो।

फिर भी, हम प्रोफेसर वकील द्वारा सुझाये भारतकी इस मुख्य बीमारीके इलाजों पर जरा नजर डाल कर देखें। उनका यह कहना बिलकुल सही है कि असली समस्या

  1. २७ सितम्बर और ४, ११ व १८ अक्तूबर, १९२८ के अंकोंमें।
  2. १२, १९, २६ जुलाई, २ और ९ अगस्त, १९२८ के यंग इंडिया में, देखिए खण्ड ३७, पृष्ठ ४७ और २४८-४९ भी।