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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/३६२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय


यदि आप लोग भारतको स्वतन्त्र करना चाहते हैं तो औपनिवेशिक दर्जे और स्वाधीनताको बहस बन्द कीजिए और बस इतना याद रखिए कि स्वराज्य वही है जिसकी रूपरेखा हमने यहाँ [इस रिपोर्ट में] रखी है। नेहरू समितिकी उस सिफारिशका समर्थन करनेके लिए मैं साबरमती आश्रम से इतनी दूर यहाँ आया हूँ, और यह इसलिए कि यह नेहरू रिपोर्ट मद्रास कांग्रेसके आदेशका प्रत्यक्ष फल है। आज तो हम इसे ही एक प्रकारका स्वराज्य मान सकते हैं। कल उसका रूप क्या होगा, मैं नहीं जानता। हमें सत्यके लिए सदा आग्रह करना चाहिए। यदि लोग सत्य, आत्मसम्मान, प्रतिज्ञाओं और परम्पराका त्याग कर देते हैं तो वे स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि वे उसके अयोग्य हैं।

आप उस समझौते का सम्मान कीजिए जो मैंने विषय समितिमें तैयार किया है। यदि आप समझते हैं कि मैं कांग्रेसके आदर्शको नीचा कर रहा हूँ तो आप मेरा खण्डन कीजिए और मेरी बात मत सुनिए। मैं नहीं चाहता कि आप इस प्रस्तावको सिर्फ इसलिए स्वीकार कर लें कि यह मैंने रखा है। आप इसे तभी स्वीकार करें जब आप निर्धारित कार्यक्रमको पूरा करनेको तैयार हों। यदि आप इसे अस्वीकार करते हैं तो आपको कोई और अध्यक्ष चुनना होगा, क्योंकि आपके अध्यक्ष इस प्रस्तावके प्रधान प्रेरक हैं। बहुमत प्राप्त करनेके लिए गन्दी जोड़-तोड़ करने में मेरा विश्वास नहीं है। इससे स्वराज्य में और देर लगेगी। यदि आप स्वराज्य चाहते हैं तो इस प्रस्तावके पक्षमें राय देकर इस तरहके सब विचार अपने मनसे हटा दीजिए।[]

महात्मा गांधीने बहसका उत्तर देते हुए कहा कि उन्होंने ये बातें खास तौरपर बंगालके युवकोंको लक्ष्य करके कही हैं। यदि वे एक क्षणको भी यह सोचते हैं कि एक बेचारा गुजराती बंगालके युवकोंको समझ नहीं सकता, तो यह बंगाल के युवकोंकी एक भारी भूल होगी।[]

मैं आपसे यह प्रार्थना करूँगा कि एक साथी कार्यकर्ताकी हैसियतसे जब मैं आपसे कुछ शब्द कहने की कोशिश कर रहा हूँ तो आप मुझे बीचमें न टोकें। परन्तु यदि आप मुझे बीच में टोकना ही चाहते हैं, तो मैं बैठ जाऊँगा और भाषण नहीं दूंगा लेकिन यदि आप मुझे सुनना चाहते हैं तो मेरी बात बिलकुल खामोशी से सुनिए। मैं यह चीज बिलकुल साफ कर देना चाहता हूँ कि यदि आप बुद्धिमान हैं तो स्वाधीनता और औपनिवेशिक दर्जेके झगड़ेके इस भूतको अपने दिमागसे निकाल दीजिए। औपनिवेशिक दर्जे और स्वाधीनतामें कोई विरोध नहीं है। मैं कोई ऐसा औपनिवेशिक दर्जा नहीं चाहता जिससे मेरे पूर्ण विकास में, मेरी स्वाधीनतामें बाधा पड़े। मेरा कहना है कि ये शब्द भ्रामक हैं। इसलिए मैं यह कहना चाहता हूँ कि हम ऐसी स्वाधीनता चाहते हैं जिससे हम अपना पूरा विकास कर सकें हम स्वयं अपने भाग्यके निर्माता हैं, और मेरा कहना यह है कि नेहरू रिपोर्टके रचयिता आपके द्वारा नियुक्त आपके अपने देशवासी हैं। इस दस्तावेजकी तैयारी में सरकारका कोई हाथ

 
  1. इससे आगेका अंश १-१-१९२९ की अमृतबाजार पत्रिकासे लिया गया है।
  2. "नहीं, नहीं" की दो-तीन आवाजें सुनाई पड़ीं।