नहीं रहा है । इस दस्तावेजका उद्गम मद्रास कांग्रेस है । मद्रास कांग्रेस द्वारा ही यह समिति नियुक्त की गई थी; और मैं आपसे फिलहाल इस रिपोर्टका समर्थन करने के लिए कहता हूँ । कल तीसरे पहर मैंने सुना कि उन लोगोंकी ओरसे जिनके बारेमें मेरा यह ख्याल था कि वे मेरे प्रस्तावके समर्थक हैं, पूरी गम्भीरताके साथ एक संशोधन रखा जानेवाला है; तभीसे मुझे यह सवाल परेशान कर रहा है ।
मैंने जो प्रस्ताव इस सभा के सम्मुख रखा है, वह एक समझौतेका परिणाम । जो प्रस्ताव मैंने शुरूमें तैयार किया था, वह आपने देखा नहीं है । जो प्रस्ताव छापा गया था और विषय समितिमें रखा गया था, वह भी एक प्रकारसे अनौप चारिक समझौते या एक तरहकी सहमतिका परिणाम था -- अब आप उसके लिए कोई भी शब्द प्रयुक्त कर सकते हैं। वह प्रस्ताव अकेले मैंने तैयार नहीं किया था; उसमें कई दिमाग लगे थे। कोशिश यह रही थी कि जहाँतक सम्भव हो, ज्यादासे- ज्यादा पक्षोंको सन्तोष दिया जा सके। उस प्रस्तावपर विभिन्न लोगोंने, ऐसे लोगोंने जिन्हें अलग-अलग पक्षोंका प्रतिनिधि माना जाता था, विचार-विमर्श किया था। मेरा मतलब यह नहीं है कि आप उस प्रस्तावका समर्थन करनेके लिए बाध्य हैं, पर मैं यह जरूर कहना चाहता हूँ कि जो लोग उस प्रस्तावके पीछे समझे जाते हैं वे नैतिक दृष्टिसे उसका समर्थन करनेके लिए बाध्य हैं ।
यदि कोई इसके आधारपर यह सोचे कि मैं आपकी भावुकताको उभार रहा हूँ तो यह उसकी गलती होगी । व्यक्तिकी आत्मसम्मानकी भावनाको जगानेकी कोशिश की जा सकती है और मुझे इस बात में गर्व महसूस होता है कि मैंने उसी भावनाको जगाने की कोशिश की है । जो लोग इस समझौते के पीछे थे यदि उन्हें बाद में यह लगा हो कि उन्होंने भारी भूल की है और उन्हें अपनी स्थिति दुनियाके आगे अवश्य स्पष्ट करनी चाहिए और यह कहना चाहिए कि जो कुछ उन्होंने पहले किया था उसके लिए उन्हें पश्चात्ताप है, तो मेरा कहना यह है कि पश्चात्ताप अपेक्षाकृत एक अधिक कड़ी धातुकी बनी चीज होती है । वह संशोधनोंका बना नहीं होता । उसके लिए दूसरे कड़े कदम उठाने होंगे । जो लोग इस समझौते के पीछे थे यदि वे यह समझते हैं कि उन्होंने कोई ऐसी भारी भूल नहीं की है, बल्कि भूल सिर्फ दाँव-पेंचकी हुई है या ऐसी भूल हुई है जिससे कोई पक्ष नाराज हो सकता है, तो मेरा कहना यह है कि उस भूलको पी जाना और इस समझौतेपर कायम रहना उनका एक अनिवार्य कर्त्तव्य है। यदि आपमें आत्मसम्मानकी वह भावना नहीं है और कोई वचन देते समय आपमें यह निश्चय नहीं है कि वह हर कीमतपर पूरा किया जाना चाहिए. तो मैं कहूँगा कि आप इस राष्ट्रको स्वतन्त्र नहीं कर सकेंगे ।
आप अपने ओठोंसे स्वाधीनताका नाम उसी तरह जप सकते हैं जैसे कि मुसल- मान अल्लाहका नाम या एक धार्मिक हिन्दू कृष्ण या रामका नाम जपता है । परन्तु यदि उसके पीछे आत्मसम्मानकी भावना नहीं है तो वह सब जप बिलकुल थोथा रहेगा। यदि आप अपने खुदके ही शब्दोंपर कायम रहनेको तैयार नहीं हैं, तो स्वा- धीनता कहाँ रहेगी? स्वाधीनता आखिरकार कोई अधिक कड़ी ठोस बात है । वह