मैं समझ सकता हूँ कि एक ब्रिटिश नागरिकके लिए हमारा दृष्टिकोण समझना कठिन है। फिर भी मुझे खुशी है कि वह इसकी कोशिश कर रहा है । मेरी स्थिति बहुत ही स्पष्ट है । मेरे लिए औपनिवेशिक दर्जेका अर्थ स्वाधीनता ही है; ब्रिटेनकी नेकनीयतीमें शक होने के कारण, और मुझे डर है कि कुछ हदतक अपने दलीय उद्देश्योंके कारण भी लोग इन दोनोंमें भेद कर रहे हैं। पर यह लड़ाई ज्यादातर शब्दोंकी है । जहाँतक मेरे अपने और कांग्रेसके लक्ष्यका सवाल है, दरअसल गलत- फमीकी कोई गुंजाइश नहीं है। हम 'होमरूल ' -- अपने ही द्वारा बनाया गया स्वतन्त्रताका संविधान • चाहते हैं, जो बाहरसे थोपा गया संविधान नहीं है । नेहरू संविधान हमारा अपना बनाया हुआ है । यदि वह स्वीकार कर लिया जाता तो इसका अर्थ है कि हम स्वेच्छासे ब्रिटेनके भागीदार और अपने भाग्यके आप निर्माता बन जाते हैं ।
[प्र० ] ऐसी स्थिति में आपने उन लोगोंके आगे जिनके लिए स्वाधीनता औप- निवेशिक दर्जे जैसी ही चीज नहीं है, और उसका अर्थ साफ-साफ ब्रिटेनसे सम्बन्ध- विच्छेद है, आत्मसमर्पण क्यों किया ? ब्रिटिश लोग इसे आत्मसमर्पणके सिवा और कुछ नहीं मान सकते ।
श्री गांधीने उत्तर देने से पहले प्रश्नपर ध्यानसे विचार किया ।
एक तरह से मैंने उन लोगोंके आगे जिन्हें आप उग्रपंथी मानते हैं, आत्मसमर्पण किया है । पर यह आत्मसमर्पण उन मुद्दोंपर है जिनका मेरे ख्याल से वास्तविक स्थितिपर असर नहीं पड़ता । जिस सिद्धान्तपर मैं सदा जमा रहा हूँ और जमा रहूँगा, मैंने उसपर आत्मसमर्पण नहीं किया है । मेरा लक्ष्य हर हालत में सम्बन्ध-विच्छेद नहीं है । जब इच्छा हो तब सम्बन्ध-विच्छेदका अधिकार मेरा लक्ष्य है ।
[प्र० ] फिर भी आपने 'होमरूल' की अपनी माँगके साथ नेहरू रिपोर्ट के आधार पर एक ऐसी समयकी सीमा जोड़ दी है जो आप स्वयं असम्भव मानते होंगे । वस्तुतः आपने ब्रिटिश पार्लियामेंट के सिरपर पिस्तौल तान दी है । आप यह घोषणा कर रहे हैं कि यदि नेहरू रिपोर्ट इस साल ३१ दिसम्बरतक स्वीकार नहीं की गई तो कोई भयानक चीज होकर रहेगी ।
श्री गांधीने अपना सिर हिलाया और शान्तिसे कहा :
आप गलत कह रहे हैं । हम ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि ब्रिटिश पार्लियामेंट के सिरपर पिस्तौल तान सकें; और मैं आपकी यह बात माननेको तैयार नहीं हूँ कि समयकी जो सीमा हमने रखी है वह असम्भव है। यदि ब्रिटेनको आज एक और युद्धका खतरा पैदा हो जाये तो वह उस परिस्थितिका सामना करने और उससे निपटनेको तुरन्त तैयार हो जायेगा । परन्तु भारतीय परिस्थितिको वह इतना गम्भीर नहीं समझता कि उससे तुरन्त निपटना आवश्यक माने । यही ब्रिटेनकी एक जबर्दस्त गलती है । भारतीय परिस्थितिको वह पर्याप्त महत्त्व नहीं देता । इसे वह साम्राज्यके कारोबारका एक छोटा मामला समझता है, एक ऐसा छोटा मामला जिसे बार-बार टाला जा
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