सकता है, जिसपर जब कोई और चिन्ता नहीं रहेगी ऐसे किसी दिन ध्यान दिया जायेगा । यही वह चीज है जिसपर हमें रोष है, और यही वह चीज है जो इस भयानक शकको और बढ़ा रही है, जिससे हमारे राजनीतिक जीवनका पूरा वातावरण विषाक्त हो रहा है। ब्रिटिश लोगोंके नेताओंको इस सालके अन्दर अन्दर हमसे मिलने के लिए कोई निश्चित, गम्भीर और निश्छल कदम उठाना चाहिए और तब अन्तिम चेतावनियों और समयकी सीमाओंकी आवश्यकता नहीं रहेगी ।
[प्र० ] यदि ब्रिटिश संसद ने नेहरू संविधानको ३१ दिसम्बर तक स्वीकार नहीं किया, तो क्या होगा ?
श्री गांधी मुस्कराये [ और बोले :]
मैं एक अदम्य आशावादी हूँ । ३१ दिसम्बर, १९२९ की अर्ध रात्रितक मैं बराबर आशा रखूंगा - और प्रार्थना करूँगा कि जिस निश्चित कदमकी हम माँग कर रहे हैं, ब्रिटेन उसे उठायेगा ।
[प्र० ] और यदि आपकी आशाएँ पूरी नहीं हुई तो ? महात्माजी ने उत्तर देनेसे पहले एक क्षण सोचा :
उस स्थिति में १९३० के नववर्षके दिन जब मैं उठूंगा तो मैं पूर्ण स्वाधीनता- वादियोंके पक्ष में होऊँगा ।
परन्तु मुझे आशा और विश्वास है कि हालतें कुछ ऐसी बन सकेंगी कि मुझपर एक और भारतीय दुःखान्त नाटकका पर्दा उठानेकी जिम्मेदारी नहीं आयेगी। अपनी बातको सार रूप में रखते हुए उन्होंने कहा :
ब्रिटेनकी नेकनीयती में शकके कारण भारतका राजनीतिक वातावरण विषाक्त हो रहा है । उस शकको दूर किया जाये तो ब्रिटेनके नेताओं और हमारे अपने नेताओं में सहमतिके लिए रास्ता साफ हो जायेगा; और हमारी सभी कठिनाइयाँ सुलझ जायेंगी ।
[ अंग्रेजीसे ]
इंग्लिशमैन, ३-१-१९२९