लेकिन यह एक साहसिक उपाय है और पण्डित मोतीलाल नेहरू और उनके साथ इस रिपोर्टपर जिन अन्य लोगोंने हस्ताक्षर किये हैं वे ही उस उपायको आजमाने लायक व्यक्ति हैं। हमारे लेखकका काम केवल यह था कि जो भी सरकार देशकी इस सबसे विकट समस्याको सुलझाना चाहे उसके लिए एक योजना प्रस्तुत कर दे।
लेकिन मैंने यह आशा की थी — विशेषकर इसलिए कि वे ये लेख 'यंग इंडिया' के लिए लिख रहे थे — कि वे उस एक सर्वोत्तम उपायपर जरूर विचार करेंगे, जिसकी वकालत इन पृष्ठों में बराबर की जाती रही है और जिसे जहाँतक आजमाया गया है, वहाँतक कुछ कम सफलता नहीं मिली है। यह सच है कि प्रोफेसर साहबने उस नन्हेसे चक्र — चरखे — को अपने सुझावोंके विशाल वृत्तके अन्दर एक छोटा-सा स्थान, जिसकी ओर सहज ही ध्यान नहीं जा सकता, तो दे दिया है। लेकिन मैं इसके लिए एक विशाल वृत्तमें छोटे-से बिन्दुके जैसा स्थान दिये जानेका नहीं बल्कि उस केन्द्रीय स्थानका दावा करता हूँ जहाँसे असंख्य दूसरी चीजें शाखाओंकी तरह फूटकर निकल सकती हैं और इनमें कई वे चीजें भी शामिल हैं जो विद्वान लेखकने सुझाई हैं। लेकिन तथ्य यह है कि जहाँ धैर्य और मनोयोगपूर्वक तथा बहुत ही प्रीतिकर ढंगसे लिखे अपने लेखों द्वारा भारतकी गहरी और दिन-दिन अधिकाधिक गहरी होती जा रही गरीबीको सिद्ध कर पाना उनके लिए सम्भव था, वहाँ इस बीमारीकी जड़का पता लगाना और उनके सुझाये इलाजको बरदाश्त कर सकनेकी रोगीकी क्षमता समझ पाना उनके लिए असम्भव था। यह सम्भव तो तभी होता जब उन्होंने अपने दिमागको खुला और वास्तविकताओंको ग्रहण करनेके लिए तैयार रख कर निकटसे कुछ गाँवोंका अध्ययन किया होता, मगर उन्होंने वैसा नहीं किया। ग्रेग[१] जैसे व्यक्तिको पूरे साल भर अध्ययन करना पड़ा और ग्रामीण लोगोंके बीच रहना पड़ा। तब कहीं वे इस देशकी गरीबीका सही इलाज जान पाये और तभी उन्होंने उस इलाजकी क्षमता एक ऐसे नये दृष्टिकोणसे सिद्ध की जो अन्यत्र दुर्लभ है। समझनेकी असली चीज यह है कि यहाँ पहलेसे ही करोड़ों मेहनतकश लोगोंको भयंकर बेरोजगारी, विवशताकी बेरोजगारीका सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें वर्षके कमसे-कम चार महीने कोई काम नहीं मिलता। इस तथ्यको हृदयंगम कर लेनेके बाद स्वभावतः यह निष्कर्ष निकालना पड़ेगा कि इन करोड़ों लोगोंको क्षण-भरकी भी देर किये बिना कोई धन्वा सुलभ करानेका प्रयत्न करना चाहिए ताकि इनके बरबाद होते समयका सदुपयोग हो सके। जो दूसरी बात समझनी है वह यह कि यदि इस देशके लोगोंकी औसत दैनिक आय सात पैसा अर्थात मुद्रा विनिमयकी वर्तमान दरके अनुसार इंग्लैंड की दो पेनोसे भी कम है तो इसे देखते हुए उन करोड़ों मेहनतकश लोगोंकी औसत आमदनी स्पष्टतः इससे भी कहीं कम होगी। जो कोई भी उनकी आयमें प्रतिदिन दो पैकी वृद्धि करेगा और सो भी बिना कोई बड़ी पूँजी लगाये, वह वास्तव में उनकी आय में राजसी वृद्धि करेगा और इन करोड़ों लोगोंके निराश हृदयों में फिरसे आशाका
- ↑ रिचर्ड बी॰ ग्रेग।