अतः पहली और अत्यन्त महत्त्वकी बात तो यह है कि कांग्रेसके रूपका पुनर्गठन हो । जल्दी में मसविदा बनानेके कारण मेरे दूसरे प्रस्तावमें कांग्रेसके पुनः संगठनकी बात पाँचवें नम्बरपर चली गई है । उसका उचित स्थान तो पहला ही था । क्योंकि कांग्रेसको ऊपरसे नीचेतक सुधारे और बदले बिना कुछ और हो नहीं सकेगा । अगर खुद कांग्रेस, जो नमक है, अपना स्वाद खो दे तो उसमें नमकका स्वाद काहेके बल पर पैदा किया जा सकेगा। कांग्रेस ही शक्तिका वह भण्डार है जहाँसे सारे कामके लिए आवश्यक तमाम शक्ति प्राप्त की जाती है । यदि शक्तिका भण्डार (पावर हाउस) ही निकम्मा हो, अव्यवस्थित हो तो तमाम राष्ट्रीय कार्यका भी वैसा ही हो जाना आवश्यक है ।
गत कांग्रेस में जो प्रतिनिधि आये थे, वे ज्यादातर स्वयंनियुक्त थे । कांग्रेस- संगठनके अनुसार चुनावका जो तरीका नियत है, मालूम हुआ है कि इस बार उसका उल्लंघन किया गया था । इस महान् वार्षिक महोत्सवकी अयथार्थताओंमें यह एक भयंकर अयथार्थता थी । यदि लड़ाईको फिर वह स्वतन्त्रताके नामपर की जानी है या उसे औपनिवेशिक स्वराज्यके नामसे सुदृढ़ और सच्ची लड़ाई बनाना है तो कार्य- कारिणी समितिका सबसे पहला और आवश्यक काम कांग्रेसका पुनर्गठन करके उसपर अपना ध्यान केन्द्रित करना है । कोई भी बात छिपाई नहीं जानी चाहिए। गुपचुपकी नीतिसे हमें तनिक भी लाभ नहीं होगा । दुरावके रोगका सफलतापूर्वक निवारण करने के लिए पहले कांग्रेसकी दुनिया में उसको भली-भाँति जाहिर कर दिया जाना चाहिए । कोई भी संगठन जो जिन्दा रहना चाहता है, तो उसे प्रगति करनी चाहिए । लेकिन कांग्रेस तो आन्तरिक क्षयसे पीड़ित है । तपेदिकका ऐसा बीमार अक्सर सुर्खे, तन्दुरुस्त और मोटा-ताजा दीखता है। कांग्रेस भी क्षयरोगसे पीड़ित किसी रोगीकी सुर्खी और मोटाईका प्रदर्शन करती हुई साल-दर-साल हकीमके चर्मचक्षुओंसे अपने निकट नाशके अचूक लक्षणोंको ओझल रखे चली जा रही है । आज उसका जैसा संगठन है, उसके बलपर वह कोई भी सच्चा, संगठित और अकाट्य विरोध प्रस्तुत करनेमें असमर्थ है । अगर कलकत्तेका प्रदर्शन सच्चा था तो फिर वहाँ एकत्र विशाल जन समुदाय अनिच्छुक हाथोंसे सत्ताको खींच क्यों नहीं सका । लेकिन उत्सवमें शामिल होनेवाले वे लोग तो अपनी शक्तिको प्रकट करने नहीं गये थे; वे तो किसी सर्कस के मण्डपमें दर्शककी हैसियत से गये थे। और मजा तो इस बातका है कि कांग्रेसका मण्डप फिलिसके सर्कसके पास ही बनाया गया था और सो भी फिलिस सर्कसके परिवर्धित संस्करणके बीचोंबीच ।
पंजाबको चेतावनी
अगर हमें आगामी कांग्रेस अधिवेशनमें यथार्थता प्रकट करनी है तो इसमें ढेर परिवर्तन होना चाहिए। मेरे मतमें, यूरोपीय ढंगकी पोशाक पहने हुए कलकत्ताका स्वयं-
१. देखिए " भाषण : रचनात्मक कार्यक्रमपर, कलकत्ता कांग्रेसमें", १-१-१९२९ ।