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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/३८४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

सेवक एक दुःखदायी दृश्य उपस्थित करता था और वहाँ जो खर्च किया गया था वह राष्ट्रकी गरीबीको देखते हुए बिलकुल अनुचित था । वे (स्वयंसेवक) चीथड़े पहननेवाले रूखे किन्तु व्यवहार कुशल किसानोंके प्रतिनिधि नहीं थे । पंजाबको यह सब बदलना है ।

कांग्रेस अधिवेशनका उपयोग रुपया कमाने में नहीं किया जाना चाहिए । अगर कुछ बचत हो तो वह गरीब देशके उन सच्चे प्रतिनिधियों द्वारा प्राप्त छोटी-मोटी रकमोंमें से होनी चाहिए, जो वार्षिक उत्सवपर आलसी दर्शकोंके रूपमें नहीं बल्कि उत्सुक सिपाहियोंके रूपमें वर्ष भरके कामके सिंहावलोकनमें भाग लेने और समय आ पड़ने पर अपने उत्साहका पूरा परिचय देने को तैयार रहते हों ।

अगर मेरी चलती तो मैं कांग्रेसके प्रदर्शन और दिखावटवाले भागको उसके विचार-विनिमयवाले भागसे अलग कर देता । मैं दर्शकोंको कार्यवाहीके स्थानपर न आने देता अथवा अगर उन्हें आने देना आवश्यक हो तो मैं एक ऐसा खुला सभा- स्थान तैयार करवाता जो भिन्न भागों में बँटा हो, मजबूत हो और सुन्दरतापूर्वक बाढ़ से घिरा हुआ हो । तब सभाएँ घिरी हुई अलग जगह में प्रातःकालके आरम्भिक घंटोंमें और फिर सायंकालके समय की जा सकेंगी। इससे स्वागत समितिकी कठिनाइयाँ, उसकी मेहनत एकदम कम हो जायेगी और खर्च में भी बड़ी भारी बचत होगी । कलापूर्ण सजावट तो खुले मैदानमें बनाये गये घेरेमें भी हो ही सकती है। आरोग्यकी दृष्टिसे ये घेरे उस बन्द और दम घोटनेवाले पण्डालसे हर हालतमें अधिक पसन्द किये जा सकते हैं; पण्डाल चाहे जितना हवादार क्यों न हो, इतना खुला हो ही नहीं सकता ।

हमारा राष्ट्र अपमानकी घाटी में से गुजर रहा है। जबतक हम स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं कर लेते तबतक हमारे पास अपने वर्ष भरके कामके सिंहावलोकनके मौकेपर मनोरंजनकी, फिर वह कोलाहलपूर्ण हो या सौम्य, कोई गुंजाइश नहीं हो सकती । वह तो गम्भीर काम, आत्मनिरीक्षण और हृदयमंथन करने का सप्ताह है, वह राष्ट्रीय राजनीतिको विकसित करनेका सप्ताह है । उस समय हम एक ऐसा कार्यक्रम बनाते हैं जिसके बलपर हमें उस शक्तिसे लड़ना है जो शायद दुनियाकी सर्वाधिक बलवान और दुष्टतम शक्ति है । मैं विनयपूर्वक यह कह देना चाहता हूँ कि ध्यान बँटानेवाले कार्यक्रम, धूमधाम और प्रचण्ड मनोरंजन-सामग्रीका अमर्यादित निरर्थक प्रदर्शन बच्चोंके मनोरंजनके योग्य भले ही हो, एक ऐसी विचारक सभाके साथ तो उसका कोई मेल ही नहीं बैठता, जो अपने-आपको जीवन और मरणके गम्भीर संग्रामके लिए तैयार करने में लगी हुई हो। ऐसे कोलाहल आदिके बीच शान्तिपूर्वक विचार करना अथवा राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और शिक्षा-सम्बन्धी कार्यक्रम तैयार करना असम्भव है । अतः हमारी वार्षिक प्रदर्शनीकी विशेषता यह होनी चाहिए कि वह लोगोंको कुछ सिखानेवाली हो, उसकी व्यवस्था अखिल भारतीय चरखा संघ-जैसे किसी ऐसे योग्य मण्डलको सौंपी जानी चाहिए। सच पूछा जाये तो यही एक संघ है, जो इस कामको तबतक के लिए हाथमें ले सकता है जबतक कांग्रेस खद्दरको अपनी विदेशी वस्त्र - बहिष्कार नीतिका और भारतके लाखों-करोड़ों किसानोंकी आर्थिक दशा सुधारका केन्द्र बनाये रखती है ।