यह हड़ताल अँगूठे के आकारकी एक बदली है । लेकिन उसमें बिजली गिरानेकी शक्ति पैदा हो सकती है । मैं तो कहता हूँ कि ऐसी शक्ति पैदा हो। मुझे वर्तमान ब्रिटिश राज्य प्रणालीके प्रति न तो मान है, न प्रेम ही । मैं उसे शैतानकी कृतिका नाम दे चुका हूँ। मैं निरन्तर इस प्रणालीके नाशकी इच्छा किया करता हूँ। वह नाश भारतवर्षके नवयुवक और नवयुवतियों द्वारा हो, यह सब तरह से इष्ट है । इस नाशक शक्तिको प्राप्त करना विद्याथियोंके हाथकी बात है । अगर वे अपने भीतर उत्पन्न वाष्पका संग्रह करें तो आज वे उस शक्तिको पैदा कर सकते हैं ।
पहली बात तो यह है कि विद्यार्थी अपनी शुरू की हुई हड़तालको सफल करें । अगर उन्होंने शुरुआत ही न की होती तो उन्हें कोई कुछ भी न कहता; शुरुआत करनेके बाद अगर वे हिम्मत हार कर बैठ जायें तो अवश्य ही निन्दाके पात्र बनेंगे और अपने आपको तथा देशको हानि पहुँचायेंगे । हड़तालका अधिकसे-अधिक कटु परिणाम तो इतना हो सकता है कि प्रिन्सिपल साहब विद्यार्थियोंका हमेशाके लिए या लम्बे समय के लिए बहिष्कार करें अथवा उन्हें फिरसे भर्ती करनेके लिए कोई दण्ड निश्चित कर दें। इन दोनों चीजोंको विद्यार्थियोंको हर्षपूर्वक स्वीकार करना चाहिए। रणक्षेत्र में कूदने के बाद वीर पुरुष कभी पीछे पैर हटाता ही नहीं है । इसी तरह ये विद्यार्थी भी अब पीछे नहीं हट सकते ।
हाँ, विद्यार्थियोंको विनयका त्याग कभी नहीं करना चाहिए। वे प्राचार्यके या अध्यापकोंके सम्बन्धमें एक भी कड़वे शब्दका उच्चार न करें। कठोर शब्द बोलने- वालेका नुकसान करते हैं, जिनके लिए कहे जाते हैं उनका नहीं । विद्यार्थियोंको अपने वचनका पालन करके और कठोर काम करके बतलाना है । जरूर उसका असर होगा । उसमें से इस राज्य प्रणालीका नाश करनेकी शक्ति पैदा होगी; ऐसा हुए बिना रह नहीं सकता । हमारे युवक और युवतियाँ चीनी विद्यार्थियोंके उदाहरणको याद रखें । उनमें के एक दो नहीं बल्कि पचास हजार विद्यार्थी गाँवोंमें फैल गये और थोड़े-से समय में उन्होंने छोटे-बड़े सबको आवश्यक अक्षर ज्ञान देकर तथा दूसरी बातोंका ज्ञान देकर तैयार कर लिया । अगर विद्यार्थी स्वराज्य-यज्ञमें बड़ी तादाद में अपना हाथ बँटाना चाहते हों तो उन्हें चीनी विद्यार्थियोंके समान कुछ करके बतलाना चाहिए ।
जैसा मैं समझ सका हूँ, उसके अनुसार तो विद्यार्थी शान्तिमय युद्धमें आहुति देनेकी इच्छा रखते हैं । लेकिन मेरे समझने में भूल हो गई हो तो भी उपर्युक्त बात तो आत्मबल और पशुबल दोनों प्रकारके युद्धपर लागू होती है । अगर हम गोला- बारूदसे लड़ना चाहें तो भी संयमका पालन करना पड़ेगा; भापका संग्रह करना पड़ेगा । एक खास हदतक तो दोनोंका रास्ता एक ही है । इस्लाममें खलीफाओंने, ईसाई धर्म में क्रूसेडरोंने और राजनीतिमें क्रॉमवेल तथा उसके योद्धाओंने भोग-विलासका अपूर्व त्याग किया था । आधुनिक उदाहरण लें तो लेनिन, सन यात सेन आदिने सादगी, दुःखादिकी सहन-शक्ति, भोग-त्याग, एकनिष्ठा और सतत जागृतिका योगियोंको भी शरमानेवाला नमूना दुनियाके सामने पेश किया है। उनके अनुयायियोंने भी वफादारी और नियमपालनका वैसा ही उज्ज्वल उदाहरण पेश किया है ।