उन माँ-बेटीका रहन-सहन इतना महँगा है कि आश्रम में उसे लेकर हमेशा बेचैनी बनी रहती । उसे संयुक्त रसोई पसन्द नहीं है और आश्रम में रहनेवाले लोग भी पसन्द नहीं हैं ।
खादी शिक्षण विभागके बारेमें तो मैं यह कह चुका हूँ कि उन दोनों विचारों- का समर्थन नहीं हो सकता। एजेंसी आश्रमकी होनी चाहिए, एक व्यक्तिकी नहीं । इस विचार में मुझे कोई दोष नहीं दिखाई देता । १८ तारीखतक तो कुछ पक्का हो ही जायेगा। तुम इन सब बातोंमें भाग लो और दिलचस्पी लो, मैं यही चाहता । छगनलालपर विश्वास करो। वह निर्मल मनुष्य है और प्रयत्नशील है । तुम उसकी त्रुटियोंपर मत जाओ, उसकी भावना देखो ।
सन्नाभाईके बारेमें तो मैंने यही लिखा था कि उनका अन्तिम निर्णय ही सही मानना चाहिए। क्योंकि मन्त्रीके प्रतिकूल जान पड़नवाला कोई व्यक्ति [ आश्रममें ] नहीं रहना चाहिए ।
तुम्हें मुझे जो कुछ लिखना हो लिख देना । १८को आ सको तो आ भी जाना । दोनों ही आ सको तो दोनों ही आ जाना। नहीं तो फिर मुझे जो ठीक लगेगा वही निर्णय कर लूंगा ।
[ गुजरातीसे ]
बापुना पत्रो : श्री नारणदास गांधीने
४११. अमेरिकी देशभक्ति
श्रीयुत सी० बी० रंगमचेट्टी लिखते हैं :
पादरी ... को अमेरिकी मिशन पाठशालाओंके मुख्य अधिकारी हैं । उन्होंने श्रीयुत को, जो • • की मिशन पाठशाला में भारतीय शिक्षक हैं और जो यन्त्र -शास्त्रसे परिचित हैं, जाकर अपनी मोटरके लिए कुछ पुर्जे वगैरह खरीद लानेको कहा। श्रीयुत ने जर्मनीमें बने पुर्जे वगैरह खरीद लिये, जो अमेरिकामें बने पुर्जोसे कहीं सस्ते और बेहतर किस्म के होते हैं । पादरी ने उनको छूनेसे भी इनकार कर दिया और कहा कि यथा- सम्भव वे अपना पैसा अमेरिकाके सिवा किसी दूसरे देशमें नहीं जाने दे सकते । तब श्रीयुत ने यह सामान .में एक ब्राह्मण सज्जनके हाथ बेच दिया और अमेरिकी सामान खरीदा। इस घटना के पहले श्रीयुत . खादी पहननेका अनुरोध किया करता था, लेकिन वे सदा टालमटोल किया करते थे। अब खुद उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की है और आगेसे खादी पहनने का संकल्प किया है । आशा है कि हमारे शिक्षित और धनवान देशबन्धु