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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/४१०

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

इन पादरी महाशय के उदाहरणसे सबक लेंगे और दूसरोंके सामने खुद मिसाल पेश करेंगे ।

ऊपर मैंने नाम और स्थान जान-बूझकर नहीं दिये हैं, क्योंकि मेरे प्रयोजनके लिए वे जरूरी नहीं हैं । मेरा आशय बिलकुल स्पष्ट है । यहाँ यह नहीं देखना है कि ऊपर जिन पादरी सज्जनका जिक्र आया है वे देशभक्तिकी मर्यादाको लाँघ गये हैं या नहीं। श्रीयुत रंगमचेट्टी उक्त घटनासे जो सबक लेना चाहते हैं, वह बिलकुल उचित है । हमारे देश में हमारे लिए विदेशी वस्त्रोंके मुकाबले हाथके कते-बुने खादीके कपड़ोंको ही पसन्द करना एक गौरवपूर्णं कर्त्तव्य होना चाहिए। और इसमें हमें इससे होनेवाली असुविधाकी परवाह नहीं करनी चाहिए। जो विचार हमें अपने नजदीक के पड़ोसियोंका बिलकुल ख्याल न करके सस्ते से सस्ते बाजारसे अपनी चीजें खरीदना सिखाता है, वह बिलकुल बेकार है । आस्ट्रेलिया और अमेरिकासे मुफ्तमें भेंटस्वरूप मिलनेवाले गेहूँ हमारे लिए विष-रूप सिद्ध होंगे अगर उस भेंटका यह मतलब हो कि भारत अपने लहलहाते, हरे-भरे अनाजके खेतोंके बदले जंगली घास पैदा करनेवाला देश बन जाये और भारतवासी निठल्ले बन जायें । इसी तरह अगर भारत मैनचेस्टरका दिये हुए कपड़ेका दान स्वीकार कर ले तो वह भी भारतके लिए बहुत ही महँगा सौदा होगा । इसलिए मैं फिर दोहराता हूँ कि जबतक खादीसे देशके बेरोजगार लोगोंको काम मिलता है, खादी हमारे देशके लिए किसी भी कीमत पर सस्ती है; और अभी तो ऐसा कोई दूसरा धन्धा दिखाई भी नहीं देता जिसे अपनाकर लोग तत्काल फायदा उठा सकें ।

[ अंग्रेजीसे ]

यंग इंडिया, १७-१-१९२९

४१२. तब और अब

कांग्रेस द्वारा स्वीकृत रचनात्मक प्रस्ताव के' कुछ आलोचकोंका ख्याल है कि किसी जोरदार प्रगतिवादी नीतिके लिए लालायित कांग्रेसको मैंने अपना एक बिल्कुल ही नया प्रस्ताव पेश करके भ्रमित कर दिया है । इसपर मेरा कहना यह है कि अव्वल तो उस प्रस्तावको मैं अपनी कोई मौलिक देन नहीं कह सकता, क्योंकि वह तो अध्यक्षीय भाषणका पूरी तरह अनुसरण करता है । दूसरे, वह १९२०-२१के उस कार्यक्रमके भी अनुरूप है जिसकी आजकल सभी प्रशंसा करने लगे हैं। हाँ, कुछ और जरूरी बातें उसमें जोड़ दी गई हैं। आजकी भाँति १९२१ में भी हमारे कार्यक्रममें शराबबन्दी के साथ धरना भी शामिल किया गया था, उसमें खादी भी थी, विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार भी था, जिसमें विदेशी कपड़ेकी होलियाँ भी जलाई जाती थीं ।

१. देखिए “ भाषण : रचनात्मक कार्यक्रमपर, कलकत्ता कांग्रेसमें", १-१-१९२९ ।

२. देखिए खण्ड १९, पृष्ठ ५८२-५८४ ।