इसके साथ ही, अछूतोद्वारका आन्दोलन तथा हिन्दू-मुस्लिम एकताका प्रयत्न भी था । पर आजके इस कार्यक्रममें स्त्रियोंकी स्थिति सुधारने और ऐसी ही दूसरी सामाजिक बुराइयोंको दूर करनेकी बातें जोड़ दी गई हैं । उसमें गाँवोंका पुनर्गठन और शहरी मजदूरोंके संगठनकी बात भी है। और ये बातें ऐसी हैं जिन्हें स्वराज्य प्राप्तिके किसी भी रचनात्मक कार्यक्रममें अवश्य ही स्थान मिलना चाहिए ।
अब बताइए कि यदि कांग्रेसवाले इस सम्बन्ध में सच्ची लगन रखते हों तो क्या इस कार्यक्रम में उत्तेजना और जोशके लिए काफी सामग्री नहीं है; शराबकी दूकानोंपर धरना देना, विदेशी वस्त्रोंकी दूकानोंपर धरना देना, विदेशी वस्त्र इकट्ठे करना और उनकी होली जलाना, आदि काम किसी भी कार्यकर्ताको जोश दिलाने के लिए काफी हैं और ये ऐसी बातें हैं, जिनमें श्रेष्ठ कार्यकर्त्ताओंकी तमाम कार्यदक्षता और सूझबूझको जागृत करने और उनका भरपूर उपयोग करनेकी पूरी गुंजाइश है ।
अव १९२०-२१ के कार्यक्रमकी जो बात हमारे इस बारके प्रस्तावमें नहीं है, वह है धारा-सभाओं, अदालतों, शिक्षा-संस्थाओं और उपाधियों आदिका बहिष्कार । मुझे इससे ज्यादा खुशी और किसी बातसे न होगी जितनी यह सुनकर होगी कि देश इस सरकारको मजबूत बनानेवाली इन संस्थाओंका साथ छोड़ रहा है; या कमसे-कम कांग्रेसवाले तो छोड़ ही रहे हैं। मैं जानता हूँ कि हमें स्वराज्य तभी जाकर मिलेगा; और शायद इसके अतिरिक्त यह भी होगा कि तब कांग्रेसमें आजकी अपेक्षा बहुत कम गन्दगी रह जायेगी । लेकिन अभी वह समय आया नहीं है । आज तो कांग्रेसवाले भी व्यवस्थापिका सभाओंकी, अदालतों और शिक्षा-संस्थाओंकी उतनी ही मदद करते हैं जितनी कि अन्य लोग । और शायद इस साल जब कांग्रेस देशके लिए नेहरू रिपोर्टके अनुसार एक संविधान प्राप्त करनेका प्रयत्न करेगी, उसे धारासभाओंके द्वारा ही काम करना होगा । कुछ भी हो, अगर हम यह मानकर भी चलें कि सचमुच अगले बारह महीनोंमें देशको वह दर्जा नहीं ही मिलेगा जिसकी सिफारिश नेहरू रिपोर्ट में की गई है, तो अधीर-से-अधीर स्वाधीनतावादीके लिए भी एक सालका अरसा कोई बहुत बड़ा अरसा नहीं है; इसके बाद वह चार-सूत्री बहिष्कारका कार्यक्रम चालू कर सकता है । अगर हमें ब्रिटेनसे अपना नाता पूरी तरहसे तोड़ डालनेकी सच्ची धुन है, तो वर्षके समाप्त होते ही हम उन संस्थाओंको प्रश्रय देना कतई छोड़ देंगें, जो ब्रिटिश सत्ताकी निशानी हैं जौर जो हमें गुलाम बनाये रखनेकी साधन हैं ।
और क्या यह ठीक है कि वर्तमान कार्यक्रमको जितना नरम बताया जाता वह उतना ही नरम है ? क्या शराबखानोंपर धरना देना कोई बहुत नरमीकी बात है ? इसका उत्तर डॉ० कानुगा और उनके जत्थेके उन स्वयंसेवकोंसे पूछिए जो उस समय शराबके कुछ व्यापारियों और उनके पिट्टुओं द्वारा पीटे गये थे । इस बातका उत्तर असमके वे सैकड़ों कैदी देंगे जो केवल इसी बिनापर कि उन्होंने अफीमके अड्डोंपर धरना देनेकी हिम्मत दिखलाई थी, निर्दयतापूर्वक असमके जेलखानोंमें ठूंस दिये गये थे । इसी तरह क्या विदेशी वस्त्रोंकी होली भी कोई हल्की-फुल्की चीज