गुजरात विद्यापीठ
प्रतिवर्ष गुजरात विद्यापीठका दीक्षान्त समारोह उसके जमा-खर्चका लेखा-जोखा करनेका समय होता है । इस अवसरपर नये और पुराने विद्यार्थी एक-दूसरेसे मिलते हैं और विद्यार्थी विभिन्न प्रकारके मनोरंजनोंमें समय बिताते हैं । उपाधि-वितरणके समय कुलपतिके भाषण के बाद कोई अन्य नेता भी स्नातकोंके समक्ष भाषण देता है । इस बार सरदार वल्लभभाईको यह भाषण देना था । परन्तु परिस्थिति उनके बारडोली छोड़कर आ सकनेकी बिल्कुल ही नहीं थी । इसलिए उन्होंने आशीर्वाद भेजकर सन्तोष कर लिया। अपने आशीर्वाद-पत्र में उन्होंने विद्यार्थियोंसे कहा कि वे परीक्षामें पास हो जानेको ही शिक्षाकी इतिश्री न मान लें; बल्कि सदा यह समझें कि उनकी सच्ची शिक्षाका समय तो अब आया है ।
जब यह मालूम हुआ कि सरदार नहीं आ सकेंगे तब काकासाहबने गुरुकुल कांगड़ीके आचार्य रामदेवजीसे भाषण देनेके लिए तारसे प्रार्थना की। वे सहमत हो गये और रास्ते में कोटा उतरकर अपने साथ लाये हुए साहित्यकी सहायतासे आठ घंटे में उन्होंने एक बड़ा-सा भाषण भी लिख डाला । इसका अधिकांश भाग उन्होंने जबानी सरल हिन्दीमें सुना दिया। विभिन्न लेखकोंका विस्तृत अध्ययन करनेके फल- स्वरूप वे उनके लेखोंके उद्धरण भी सुनाते जाते थे । इस भाषणका तात्पर्य- मात्र ही यहाँ दिया जा सकता है । सरकारी शिक्षा जान-बूझकर हमारी सभ्यताका नाश करनेके लिए तथा हमारी गुलामी कायम रखने के इरादेसे बनाई गई है, यही स्पष्ट करना भाषणका उद्देश्य था । उन्होंने अंग्रेज लेखकोंके लेखों द्वारा यह बात सिद्ध कर दी । इस भाषणको छपाकर भेजनेका काम उन्होंने अपने जिम्मे लिया है । इसलिए जो उसे पूरा पढ़ना चाहते हैं उन्हें इसका अवसर मिलेगा । मैं उसमें से उद्धरण भी नहीं दे रहा हूँ। फिर इस बातके हमें रोज इतने प्रमाण मिलते हैं कि पुराने प्रमाण देकर इस बातको सिद्ध करनेकी जरूरत नहीं रहती । प्रत्येक विद्यार्थी सरकारी शालाओंमें प्रतिक्षण अपनी गुलामीका अनुभव करता है । इस भाषण में एक बात ऐसी है जो जानी हुई तो है पर हम उसे नहीं जानते । यह एक विचारने लायक बात है । पाठकों- को यह जानकर कदाचित् आश्चर्य होगा कि अंग्रेजी शासनसे पहले हमारे गाँवोंमें जितनी पाठशालाएँ थीं, अब वहाँ उनका चौथा भाग भी नहीं बच रहा है। इसका कारण यह है कि पुरानी शालाओंकी किसीने देखभाल नहीं की, उनकी प्रतिष्ठा जाती रही। गाँवोंके नेता नौकरी करके चपरासी बन गये और चूंकि प्रतिष्ठा प्राप्त सरकारी शालाएँ खर्चीली थीं इसलिए हर गाँव में उनका खोला जाना सम्भव नहीं हुआ । इस प्रकार पुरानी शालाएँ तो नष्ट हो गई, नवीन क्षेत्र अति संकुचित रहा और इससे प्राथमिक शिक्षा दुर्लभ हो गई ।
रामदेवजी का भाषण लगभग दो घंटे चला, और भी एक घंटा चल सकता था, पर हम अपने अधिवेशन में इतना समय नहीं दे सकते । इसलिए मुझे दुःखके साथ भाषणको बड़ा दिलचस्प और जोशीला होनेपर भी संक्षिप्त करनेकी विनती करनी पड़ी।