४१७. पत्र : मोतीलाल नेहरूको
प्रिय मोतीलालजी,
आपके दोनों पत्र मिले । मुझे कलकत्ते ले जानेके लिए क्षमायाचनाकी कोई आवश्यकता नहीं है। बेशक, मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि मुझे उन बहसोंमें इतना सक्रिय भाग लेना पड़ेगा जैसा कि परिस्थितियोंमें मुझे लेना पड़ा । पर यह अच्छा ही रहा । मुझे इससे काफी खुशी हुई और कांग्रेस संगठनकी वर्तमान गतिविधिके बारेमें एक अन्तर्दृष्टि मिली, जो निश्चय ही मुझे पहले प्राप्त नहीं थी । और फिर आखिर हमें भीतर और बाहर, दोनों जगह संघर्ष तो करना ही है ।
दरभंगावाला वह बड़ा मुकदमा एक बहुत ही भारी जिम्मेदारी है और वह आपका बहुत समय लेगा । अन्यथा यह समय रचनात्मक कार्यक्रमको मिल सकता था । फिर भी, मुझे खुशी है कि यह मुकदमा आपको मिल गया है । यदि यह आपको सभी आर्थिक बोझोंसे मुक्त कर दे तो फिर आप सार्वजनिक कार्यके लिए बहुत ज्यादा समय दे सकेंगे, और वह भी बिना किसी मानसिक चिन्ताके ।
अब मैं दूसरे पत्रपर आता हूँ । यदि मुझे यूरोपका कार्यक्रम पूरा करना है, तो मैं उस यात्राको मई तक नहीं टाल सकूंगा । उन तमाम मित्रोंको, जिन्होंने मुझे निमन्त्रित किया है, अपने रवाना होनेकी घड़ीतक अनिश्चयकी स्थितिमें रखनेकी मेरी हिम्मत नहीं है । यदि मैं जाता ही हूँ तो मुझे जर्मनी, आस्ट्रिया, रूस सम्भवतः पोलैंड, फ्रांस, इंग्लैंड तो जाना ही पड़ेगा; मैं इसमें इटली, टर्की और मिस्र भी जोड़ना चाहूँगा; यों मुझे इन अन्तिम तीन स्थलोंसे कोई निमन्त्रण नहीं मिला है ।
अमेरिकासे भी आग्रहपूर्ण निमन्त्रण आये हैं कि यदि मैं यूरोप जाऊँ तो अमेरिकाको भी ( अपनी यात्रामें) शामिल कर लूँ । ये सब बातें मुझे अभी तय करनी हैं या फिर बिलकुल छोड़ देनी हैं । आपके पत्रसे मुझे ऐसा लगता है कि यूरोपकी यात्रा करनेकी बात मुझे इस साल सोचनी ही नहीं चाहिए । अगले सालकी बात अगले साल देखी जायेगी। इसलिए, यदि आपका उत्तर अन्यथा न हुआ तो मैं उस यात्राको रद्द करनेकी घोषणा करना चाहता हूँ और अगले सालके लिए कोई वादा करना नहीं चाहता ।
मुझसे विदेशी वस्त्रके बहिष्कारकी एक योजना तैयार करनेके लिए कहा गया है । यदि उसे इसी पत्रके साथ तैयार करके नहीं भेजा जा सका, तो आशा है कि वह दो-एक दिनमें तैयार हो जायेगी ।
१. दिनांक १२-१-१९२९ (एस० एन० १५२७९) और १४-१-१९२९ ( एस० एन० १५२८० ) के ।
२. देखिए " खादीके जरिए विदेशी वस्त्र- बहिष्कार की योजना ”, २४-१-१९२९ ।
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