४१९. पत्र : मु० अ० अन्सारीको
प्रिय श्री अन्सारी,
आपका पत्र मिला । आशा है कि आपको अब इंफ्लुएंजासे मुक्ति मिल गई होगी । हममें से कुछ लोग जिस तरह, बिना किसी विपत्तिमें पड़े, कलकत्तेमें कामके उस भयानक बोझको झेल सके, वह मेरे लिए एक चमत्कार था । मैं अक्सर मन ही मन कहता हूँ 'ईश्वर महान है !
दिल्लीके मुस्लिम सम्मेलनके' बारेमें आप जो कुछ बता रहे हैं उसे पढ़कर दुःख होता है । हमें इसे भुला देना है। अगर हम सिर्फ अपना दिमाग ठंडा रखें, झुंझलाहटके बावजूद अपना धैर्य कायम रखें और जिसे सच्चा मार्ग समझते हैं उससे विचलित न हों, तो मैं जानता हूं कि अन्तमें सब अच्छा ही होगा ।
मैं जब दिल्लीसे गुजरा था तो डाक्टर जाकिरसे मुलाकात हुई थी । वे पूरे वक्त मेरे साथ रहे। मैं आपसे इस बात में सहमत हूँ कि अजमल फंडके चन्देका अधिकांश जामियाको दे देना चाहिए जिससे कि डाक्टर जाकिरकी चिन्ता कम से कम कुछ हदतक तो दूर हो जाये। मैं जमनालालजीको लिखूंगा या शायद वे ही वहाँ जायें। सिंधके लिए मैं इस इकतीससे पहले रवाना नहीं होऊंगा; और मैं जमना - लालजीसे कह चुका हूँ कि वे मद्रास जानेसे पहले साबरमती हो जायें, चाहे वह एक ही दिनके लिए क्यों न हो। वे इस सप्ताह किसी भी दिन आ सकते हैं । यदि वे नहीं आये तो मैं उन्हें लिखूंगा ।
आशा है आप अभीतक हिन्दू-मुस्लिम प्रश्नपर कार्य कर रहे हैं ।
लालाजीकी सोसाइटीके बारेमें आपने जो कुछ कहा वह मैंने ध्यानमें रख लिया है, और मैं आपसे इस बातमें पूर्णतया सहमत हूँ कि यदि उसमें साम्प्रदायिक झुकाव रखनेवाले सदस्य हैं तो उसे उनसे मुक्त करना चाहिए। मैं उसके मन्त्रीको और पुरुषोत्तमदास टंडनको भी लिखूंगा ।
अंग्रेजी (एस० एन० १५२८७) की फोटो नकलसे ।
१. इससे आशय उस मुस्लिम सर्वदलीय सम्मेलनसे मालूम होता है जो आगाखाँके सभापतित्वमें ३१-१२-१९२८ और १-१-१९२९ को हुआ था।
२. डा० जाकिर हुसैन। (१८९७-१९६९), भारतके तीसरे राष्ट्रपति ।