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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/४२७

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४२७. पत्र : रिचर्ड बी० ग्रेगको

सत्याग्रह आश्रम

साबरमती

१८ जनवरी १९२९

आपके पत्र नियमित रूपसे मुझे मिलते रहे हैं । परन्तु मैं सोच रहा था कि आप न्यूयार्क पहुँच जायें तभी आपको लिखना शुरू करूँ । इसीलिए मैंने आपको अब तक कोई पत्र नहीं लिखा । यह पत्र आपको यह सूचित करनेके लिए लिख रहा कि अब वैज्ञानिक ढंगसे लिखी गई आपकी पुस्तिका जो भी नाम उसे दिया जाये को छपवानेकी तैयारी की जा रही है । मैंने अबतक उसका नाम निश्चित नहीं किया है । और मुझे यह स्वीकारते हुए तो शर्म-सी महसूस हो रही है कि मैं उसे अबतक पूरा नहीं पढ़ पाया हूँ । परन्तु उसके प्रकाशनकी बात तय हो चुकी है; और चूंकि इतना तय हो चुका है इसलिए मैं उसे जल्दी से जल्दी पूरा पढ़ जानेकी कोशिश कर रहा हूँ ।

मैं अब फिर दूधके बिना रहनेका प्रयोग कर रहा हूँ । मैं आजकल भोजनके रूपमें पिसे हुए बादाम, टमाटर, एक कोई दूसरी सब्जी और रोटी ही ले रहा हूँ । इसलिए आप मुझे आहारके बारेमें सारी नईसे-नई जानकारी अवश्य दें ।

मीराबहन बिहारमें है और वहाँ गाँवोंमें अपनी रुई आप धुननेका काम जमा रही है ।

इस समय ' मन्दिर' में अनेक यूरोपीय मेहमान हैं । डेनमार्कंसे आई दो बहनें कुछ दिनोंसे यहीं हैं; और आज ही तीन और मित्र -- दो पुरुष तथा एक महिला - आये हैं और सम्मिलित रसोई लगातार प्रगति कर रही है ।

हृदयसे आपका,

श्री रिचर्ड बी० ग्रेग
४०, ओल्ड आर्चर्ड रोड
चेस्टनट हिल
मैसाचुसेट्स, सं० रा० अमेरिका

अंग्रेजी (एस० एन० १५१४३) की फोटो नकलसे ।

१. उद्योग मन्दिर, अर्थात् साबरमती आश्रम ।