४३५. पत्र : वसुमती पण्डितको
[२० जनवरी, १९२९]
तुम्हारा पत्र मिल गया था। अच्छा हुआ जो वर्धा छोड़ दिया। इससे आज्ञाका कोई उल्लंघन नहीं हुआ । जब इच्छा हो तब यहाँ आ जाना । स्वास्थ्य अच्छा रखना और मनसे निश्चिन्त रहना । ३१को सिन्ध जानेका कार्यक्रम जैसाका तैसा है ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५०४) की फोटो नकलसे ।
सौजन्य : वसुमती पण्डित
४३६. पत्र : मीराबहनको
२० जनवरी १९२९
तुम्हारे समाचार लेकर आज कोई तार नहीं मिला। ऐसे झटके तो लगते रहते हैं। मैंने तुमको कलके तारमें सलाह दी थी कि किसी ज्यादा गरम जगह चली जाओ। मैंने राजेन्द्र बाबूको भी तार ' दिया था कि अगर वे जरूरी समझें तो तुम फिलहाल आश्रम लौट आओ। मैं जानता हूँ कि तुम्हारे बारेमें चिन्ताकी बिलकुल ही कोई बात नहीं। बीमारीको लेकर परेशान मत होना । मामूली-सी पेचिश है । दूध और फलोंके रसपर रहना चाहिए, लेकिन अगर डाक्टर फलोंका रस मना करे तो उसे फिलहाल बन्द रखना । शरीरको गरमी पहुँचाती रहो और जरूरत पड़े तो पेटपर पट्टी भी बाँधना ।
आज इतवार होनेसे कोई तार नहीं आया। उम्मीद है कल तार जरूर ही मिलेगा ।
सप्रेम ।
बापू
मैं चंगा हूँ। वजन नहीं बढ़ा; इस हफ्ते एक पौंड घटा है। लेकिन कोई
खास बात नहीं ।
अंग्रेजी जी० एन० ९३९० से; तथा सी० डब्ल्यू० ५३३५ से भी ।
सौजन्य : मीराबहन
१. डाककी मुद्दरसे ।
२. देखिए " तार : मीराबहनको ”, १९-१-१९२९ ।
३. उपलब्ध नहीं है।