४५४. पत्र : गंगाधरराव देशपांडेको
सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
२३ जनवरी, १९२९
दो पत्र अपने उत्तरकी प्रतिलिपियोंके साथ भेज रहा हूँ । मैं चाहता हूँ कि इस दौरेके बारेमें तुम राजाजीके कहनेपर अपनी राय न बनाओ बल्कि अपने ऊपर जिम्मेदारी लेकर स्वयं निर्णय करो। मेरा ख्याल है कि मेरा दौरा डाकगाड़ीकी-सी तेज रफ्तारसे नहीं रखा गया तो मैं बिना किसी कठिनाईके कार्यक्रम पूरा कर लूंगा । पर यह नहीं कह सकता कि मैं इतना समय निकाल सकूंगा या नहीं। इसलिए तुम्हें निश्चित तौरपर लिखना चाहिए कि मुझे बुलाना चाहते हो या नहीं; और यदि चाहते हो तो कहाँ, कब और कितने समयके लिए। मैं अन्य सभी बातोंका तभी कोई निर्णय कर पाऊँगा । मैं तुम्हें आगाह कर रहा हूँ कि कर्नाटकके दौरेके कार्य- क्रमको लगातार स्थगित मत करते जाओ ।
पुण्डलीकके बारेमें तुम्हारे पत्रका मुझे अब भी इन्तजार है । उनके कार्य-कलाप और उनकी जीत या हारके बारेमें मुझे कोई जानकारी न देना उचित नहीं है । तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है ?
हृदयसे तुम्हारा,
अंग्रेजी (एस० एन० १४८९५ ) की फोटो नकलसे ।
४५५. खादी सेवा संघ भी क्यों न हो ?
जब हमारे यहाँ स्नातक संघ, नागरिक सेवा संघ और ऐसे ही कई दूसरे संघ मौजूद हैं, तो फिर एक खादी सेवा संघ या खादी सेवक संघ भी क्यों न हो ? इस सेवा संघकी सफलताके लिए इसका दुनिया-भर में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं तो सबसे अधिक बहुसंख्यक तो होना जरूरी है । यह सच है कि इस सेवा संघके कर्म- चारियोंकी आय उतनी तो कदापि नहीं होगी जितनी दूसरी तरहकी उन कामों द्वारा होती है, जिनमें सेवा तो नाममात्रकी ही होती है; लेकिन जो कम या अधिक मात्रामें -- कमकी अपेक्षा शायद अधिक कहना ही ठीक होगा शोषणपर ही निर्भर करते । खादी सेवा तो एकदम लोकसेवी संस्था है और इसके सेवकोंका भरण- पोषण केवल इस सिद्धान्तपर होता है कि मजदूरको उतना ही मिलना चाहिए जितनी
देखिए "पत्र : गंगाधरराव बी० पुण्डलीकको ", ९-१-१९२९ ।