४६७. पत्र : मोतीलाल नेहरूको
आश्रम
साबरमती
२४ जनवरी १९२९
आपका तार मिल गया । आपको पत्र लिखनेके बाद मैंने लगभग यही मनःस्थिति बना ली थी कि प्रस्तावित यूरोप यात्राका विचार त्याग ही दिया जाये । और अब आपके अपने निर्णयपर फिरसे विचार कर लेनेपर भी मेरे मनमें यात्राके प्रति अनिच्छा बनी हुई है। मुझे लगता है कि अगले वर्ष हमें कुछ काम कर दिखाना चाहिए, और अगर हम सचमुच ऐसा चाहते हैं तो मुझे चालू वर्षमें भारतसे अनुपस्थित नहीं रहना चाहिए। मुझे तो अगले वर्षके संघर्षके लिए जमीन तैयार करनेमें जो और जितनी मदद बन पड़े, देनी चाहिए। रचनात्मक कार्यक्रम सम्बन्धी प्रस्ताव पेश करनेके बाद तो कुछ ऐसा हो गया है कि यदि मेरे लायक कोई काम मुझे देश में नजर आ जाता है तो बाहर जानेके ख्याल-भरसे ऐसा लगने लगता है जैसे मैं अपने कर्त्तव्य से भाग रहा हूँ । यदि मैं अप्रैलके अन्तमें जाऊँ तो अक्तूबरके मध्यसे पहले कैसे लौट पाऊँगा ? अपने पिछले पत्रमें मैंने यूरोप यात्राके विस्तृत कार्यक्रमकी जो रूपरेखा बतलाई थी, अगर उसे पूरा करूँ, खासकर अमेरिकाको भी शामिल करनेकी बात सोचूँ तो इतना समय लग ही जायेगा । इसीलिए मैं इस वर्षकी यूरोप यात्राके बारे में जितना अधिक सोचता हूँ, मनमें उतनी ही अधिक अनिच्छा पैदा होती जाती है । और फिर अगले वर्ष तो शायद इसका प्रश्न भी नहीं उठाया जा सकेगा । इसलिए फिलहाल मैं बड़ी दुविधामें हूँ ।
इस मामले में मैं आपको और अधिक परेशान नहीं करना चाहता । और मैंने समझ लिया है कि मुझे अपना निर्णय स्वयं ही करना चाहिए। पर आपको अगर कोई बात सूझे तो कृपया मुझे लिख अवश्य दें। मैं फिलहाल वल्लभाई, जमना- लालजी, राजगोपालाचारी और अन्य लोगोंसे इसके बारेमें सलाह-मशविरा कर रहा हूँ और आशा है कि अब चन्द ही दिनोंमें अन्तिम रूपसे निर्णय कर लूँगा ।
एक डेनिश बहन हैं, जिनको कांग्रेसके अन्दरूनी संगठनकी कोई जानकारी नहीं, वे हमारे प्रस्तावको देखकर बड़े ही उत्साहमें आ गई और लिखती हैं : परतन्त्र
१. ३१ दिसम्बर, १९२९ के बाद अहिंसापूर्ण असहयोगका आन्दोलन शुरू करनेकी कांग्रेसकी योजना थी। देखिए " भाषण : नेहरू रिपोर्ट सम्बन्धी प्रस्तावपर कलकत्ता कांग्रेसमें-३, ३१-१२-१९२८ ।
२. देखिए " भाषण : रचनात्मक कार्यक्रमपर, कलकत्ता कांग्रेस में ", १-१-१९२९ ।
३. १७-१-१९२९ का ।
४. एन मेरी पोटर्सन । देखिए "पत्र : एन मेरी पोटर्सनको ", २०-१-१९२९ ।