सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/४५९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

४७०. पत्र : जाहिद अलीको

आश्रम

साबरमती

२५ जनवरी, १९२९

प्रिय जाहिद अली,

तुम्हारा खत मिल गया । मेहरबानी करके यह लिखो कि तुम्हारे पास कितने चरखे हैं, वे ठीक चालू हालत में हैं या नहीं, क्या उनमें तकुए हैं। मुझे चरखोंका आकार उनके तकुओंके मोढ़िये और दूसरी तफसील भी बताओ। यह भी लिखो कि उनकी कितनी कीमत देनी पड़ेगी। तब मैं जो कर सकता हूँ, करूँगा ।

हृदयसे आपका,

श्री जाहिद अली
छोटानी सॉ मिल्स
शिवरी बन्दर, बम्बई

अंग्रेजी (एस° एन° १४९९५ ) की माइक्रोफिल्मसे ।

४७१. पत्र : होरेस जी० एलेक्जेंडरको

सत्याग्रह आश्रम

साबरमती

२५ जनवरी, १९२९

प्रिय मित्र,

आपका पत्र मिल गया था । इसे मैं बहुत काफी दिनोंतक अपने पास यों ही डाले रहा ।

निश्चय ही आपने पहला पत्र किसी गलत भावनासे नहीं लिखा था । अब मुझे 'क्वेकर ' साहित्यका एक पार्सल मिल गया है, मेरा ख्याल है कि आपकी ही मेहरबानीसे ।

१. दिनांक १५-८-१९२८ के इस पत्र में कहा गया था: “आशा है कि मेरे पहले पत्रके विस्तारने आपके दिमागपर अनावश्यक भार नहीं डाला होगा।... आपके उत्तरसे मुझे थोड़ी आशंका हो चली है कि कहीं वह गलत भावनासे लिखा गया तो नहीं था। श्री एन्टयज मुझे बतलाते रहे हैं कि गणेशन द्वारा प्रकाशित आपके साहित्यकी विक्रीके लिए इंग्लैंड में इस समय कोई केन्द्रीय विक्रय शाखा नहीं है । . . . यदि आप अनुमति दें तो 'फ्रेंडस बुक सेंटर' आशय ' क्वेकर्स' से है ) यह काम कर सकता है। मुझे सीख सकते हैं।... हमारा नया 'फ्रेंडस हाउस' ही है। दोनोंके बीच की दूरी तय करनेमें केवल तीन (मैं समझता हूँ आप जानते ही होंगे कि 'फ्रेंडस' से पूर्ण विश्वास है कि 'क्वेकर्स' आपसे बहुत-कुछ और विक्रय केन्द्र 'इंडियन स्टूडेंट्स होस्टल के पास मिनट लगते हैं...।”