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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/४६३

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४७६. पत्र : एस्थर मेननको

साबरमती आश्रम

२५ जनवरी, १९२९

तुम्हारे पत्र मिले; वह पत्र भी जो तुमने डेनिश बहनोंके हाथ भिजवाया था, मिल गया है। वे यहाँ सप्ताह-भरके लिए आई थीं। अभी दो दिन पहले ही गई हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि आश्रमके जीवनमें उनको बड़ा आनन्द आया । यहाँ आजकल १७५ से ऊपर स्त्री-पुरुष और बच्चे एक ही स्थानपर बैठकर एक-साथ भोजन करते हैं ।

मारियाने मुझे लिखा है कि तुम अभीतक कमजोर बनी हो; आपरेशनके बादकी कमजोरी पूरी तौरपर दूर नहीं हो पाई है, लेकिन इस वर्षके अन्ततक तुम और मेनन दोनों वापस आ रहे हो न ? तुम दोनोंको और बच्चोंको अपनी आँखोंके सामने पाकर सचमुच बड़ी खुशी होगी ।

इस वर्ष यूरोप यात्राके बारेमें अभी कुछ भी निश्चित नहीं है । लेकिन मैं ही कुछ हिचक रहा हूँ - खासकर कांग्रेसके प्रस्तावके ख्यालसे । मारिया कहती है कि स्वतन्त्र भारतका सन्देश लेकर ही मेरा यूरोप जाना सबसे ठीक रहेगा । मेरी बुद्धि भी यही ठीक मानती है, लेकिन मैं मार्ग-दर्शनके लिए ईश्वरसे प्रार्थना कर रहा हूँ ।

हृदयसे तुम्हारा,

श्रीमती एस्थर मेनन
१४, एसिलवे
टार्काक
डेनमार्क

अंग्रेजी (एस० एन० १५१३०) की फोटो - नकलसे ।